रूपसाहि(रीतिग्रंथकार कवि)

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रूपविलास की पांडुलिपि का अंतिम पृष्ठ

रूपसाहि रीतिकाल के रीतिग्रंथकार कवि हैं।

ये बागमहल पन्ना (बुंदेलखंड) के रहनेवाले और जाति के गुनियार कायस्थ थे। इनके पिता का नाम कमलनैन तथा पितामह का शिवराम था। इनके आश्रयदाता थे छत्रसालवंशीय महाराज हिंदूपति सिंह (सं. 1815-1834 वि.)। कवि ने इन्हीं के प्रीत्यर्थ अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'रूपविलास' की रचना की, जिसकी समाप्ति 4 सितंबर सन्‌ 1756 ई. को हुई थी।

नागरीप्रचारिणी सभा, काशी के याज्ञिक संग्रहालय में इसकी एक हस्तलिखित प्रति वर्तमान है। पूरे ग्रंथ में 900 दोहे हैं और वह 14 'विलासों' में विभक्त है। यह रीतिग्रंथ काव्य के सर्वांग (विविधांग) पर विचार करता है- काव्यलक्षण, छंद (पिंगल), नौ रस, नायक नायिका, अलंकार और षड्ऋतु, आदि आदि। अलंकारों के वर्णन में कवि ने, 'भाषाभूषण' की परिपाटी को ग्रहण कर लक्षण और उदाहरण एक ही दोहे में दिए है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने अनेक काव्यवृत्तियों को विभिन्न रसों का समर्वाय माना है। इस प्रकार, कवि का कृतित्व जितना काव्यशास्त्रीय विवेचन की दृष्टि से महत्व का है उतना कवित्व के विचार से नहीं।

संदर्भ ग्रंथ

  • मिश्रबंधु : मिश्रबंधु विनोद, भा. 2;
  • खोज विवरण, वार्षिक 1905 ई.
  • शिवसिंह सेंगर : 'शिवसिंहसरोज'