नवगीत
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नवगीत, हिन्दी काव्य-धारा की एक नवीन विधा है।[१] इसकी प्रेरणा सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई और लोकगीतों की समृद्ध भारतीय परम्परा से है। हिंदी में तो वैसे महादेवी वर्मा, निराला, बच्चन, सुमन, गोपाल सिंह नेपाली आदि कवियों ने काफी सुंदर गीत लिखे हैं और गीत लेखन की धारा भले ही कम रही है पर कभी भी पूरी तरह रुकी नहीं है। वैसे रूढ़ अर्थ में नवगीत की औपचारिक शुरुआत नयी कविता के दौर में उसके समानांतर मानी जाती है। "नवगीत" एक यौगिक शब्द है जिसमें नव (नयी कविता) और गीत (गीत विधा) का समावेश है।[२]
गीत और नवगीत में अन्तर
गीत और नवगीत में काल (समय) का अन्तर है। आस्वादन के स्तर पर दोनों को विभाजित किया जा सकता है। जैसे आज हम कोई छायावादी गीत रचें तो उसे आज का नहीं मानना चाहिए। उस गीत को छायावादी गीत ही कहा जायेगा। इसी प्रकार निराला के बहुत सारे गीत, नवगीत हैं, जबकि वे नवगीत की स्थापना के पहले के हैं। दूसरा अन्तर दोनों में रूपाकार का है। नवगीत तक आते-आते कई वर्जनाएं टूट गईं। नवगीत में कथ्य के स्तर पर रूपाकार बदला जा सकता है। रूपाकार बदलने में लय महत्वपूर्ण 'फण्डा' है। जबकि गीत का छन्द प्रमुख रूपाकार है। तीसरा अन्तर कथ्य और उसकी भाषा का है। नवगीत के कथ्य में समय सापेक्षता है। वह अपने समय की हर चुनौती को स्वीकार करता है। गीत की आत्मा व्यक्ति केन्द्रित है, जबकि नवगीत की आत्मा समग्रता में है। भाषा के स्तर पर नवगीत छायावादी शब्दों से परहेज करता दिखाई देता है। समय के जटिल यथार्थ आदि की वजह से वह छन्द को गढ़ने में लय और गेयता को ज्यादा महत्व देता है।
नवगीत क्या है
१. नवगीत में एक मुखड़ा और दो या तीन अंतरे होने चाहिये। २. अंतरे की अंतिम पंक्ति मुखड़े की पंक्ति के समान (तुकांत) हो जिससे अंतरे के बाद मुखड़े की पंक्ति को दोहराया जा सके। ३. नवगीत में छंद से संबंधित कोई विशेष नियम नहीं है मगर पंक्तियों में मात्राएँ संतुलित रहे जिससे गेयता और लय में रुकावट न पड़े।
नवगीत कैसे लिखें
नवगीत लिखते समय इन बातों का ध्यान रखें-
१. संस्कृति व लोकतत्त्व का समावेश हो। २. तुकान्त की जगह लयात्मकता को प्रमुखता दें। ३. नए प्रतीक व नए बिम्बों का प्रयोग करें। ४. दृष्टिकोण वैज्ञानिकता लिए हो। ५. सकारात्मक सोच हो। ६. बात कहने का ढंग कुछ नया हो और जो कुछ कहें उसे प्रभावशाली ढंग से कहें। ७. शब्द-भंडार जितना अधिक होगा नवगीत उतना अच्छा लिख सकेंगे। ८. नवगीत को छन्द के बंधन से मुक्त रखा गया है परंतु लयात्मकता की पायल उसका शृंगार है, इसलिए लय को अवश्य ध्यान में रखकर लिखें और उस लय का पूरे नवगीत में निर्वाह करें। ९. नवगीत लिखने के लिए यह बहुत आवश्यक है कि प्रकृति का सूक्ष्मता के साथ निरीक्षण करें और जब स्वयं को प्रकृति का एक अंग मान लेगें तो लिखना सहज हो जाएगा।
मात्राओं की गणना
कविता या गीत को उच्चारण करने में लगने वाले समय के माप की इकाई को मात्रा कहते हैं। इसकी गणना करना अत्यन्त सरल है। हृस्व स्वर १ मात्रा जैसे अ, इ, उ, ऋ। दीर्घ स्वर एवं संयुक्त स्वर २ मात्रा जैसे आ ई ऊ ए ऐ ओ औ। व्यंजन यदि स्वर से जुड़ा है तो उसकी अलग कोई मात्रा नहीं गिनी जाती परन्तु दो स्वरों के बीच में यदि दो व्यंजन आते हैं तो व्यंजन की भी एक मात्रा गिनी जाती है। जैसे सब = २ मात्रा और शब्द = ३ मात्रा। इसी प्रकार शिल्प, कल्प अन्य, धन्य, मन्त्र, आदि सभी ३ मात्रा वाले शब्द हैं। यहाँ ध्यान रखने योग्य है कि यदि दो व्यंजन सबसे पहले आकर स्वर से मिलते हैं तो स्वर की ही मात्रा गिनी जायेगी जैसे ॰ त्रिशूल= ४, त्रि = १, शू =२, ल = १, क्षमा =३, क्षम्य = ३, क्षत्राणी = ५, शत्रु =३, चंचल =४, न्यून = ३, सज्जा = ४, सत्य = ३, सदा = ३, सादा = ४, जैसे = ४, कौआ = ४ आदि उदाहरणों से समझना चाहिये।
प्रमुख नवगीतकार
सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, [राजेन्द्र प्रसाद सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, शान्ति सुमन, माहेश्वर तिवारी, सुभाष वशिष्ठ, कुमार रवीन्द्र
नवगीत की महत्वपूर्ण पुस्तकें
- गीतांगिनी (सम्पादक: राजेन्द्र प्रसाद सिंह)1958.
- पाँच जोड़ बाँसुरी,(सम्पादक:ठाकुर प्रसाद सिंह
- ओ प्रतिक्षित - डाॅं शान्ति सुमन , 1970
- हिन्दी नवगीत उद्भव और विकास, लेखक- डा॰ राजेन्द्र गौतम
- नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह: डॉ.रवि रंजन
- नवगीत दशक (1,2,3 )
- यात्रा में साथ साथ
- नवगीत एकादश(1994)
- धार पर हम
- शब्दायन
- गीत वसुधा
- आओ खुली बयार
- रात आंख मूंदकर जगी
- भरी सड़क पर
- नवगीत २०१३
- समकालीन छंद प्रसंग(2013)
- अनुभव की सीढ़ी (2014)
- नई सदी के नवगीत (2018)
सन्दर्भ
- ↑ साँचा:cite book
- ↑ हिन्दी साहित्य का अद्यतन इतिहास, डा० मोहन अवस्थी, पृ० ३०२