भीलवाड़ा

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
The printable version is no longer supported and may have rendering errors. Please update your browser bookmarks and please use the default browser print function instead.
साँचा:if empty
नगर
उपनाम: राजस्थान की वस्त्रनगरी
साँचा:location map
निर्देशांक: साँचा:coord
देशसाँचा:flag
राज्यराजस्थान
ज़िलाभीलवाड़ा जिला
ऊँचाईसाँचा:infobox settlement/lengthdisp
जनसंख्या (2011)
 • कुल३७०,००९
 • घनत्वसाँचा:infobox settlement/densdisp
भाषाएँ
 • आधिकारिकहिन्दी, मेवाड़ी
समय मण्डलIST (यूटीसी+5:30)
पिन311001
आई॰एस॰ओ॰ ३१६६ कोडRJ-IN
वाहन पंजीकरणRJ-06
लिंगानुपात1000/915[१] /
वेबसाइटwww.bhilwara.rajasthan.gov.in

साँचा:template other

भीलवाड़ा भारत के राजस्थान राज्य में स्थित एक नगर है। यह शहर भीलवाड़ा ज़िले का मुख्यालय है। यह राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में स्थित है तथा उदयपुर से १५२ कि.मी. दूर स्थित है। राजस्थान में यह अपने वस्त्र उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, इस कारण इसे राज्य की वस्त्रनगरी भी कहते हैं। पूरा ज़िला पारम्परिक "फड़ चित्रकला" के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।

इतिहास

भीलवाड़ा का इतिहास 11वीं शताब्दी से संबंधित है और उस समय भील राजाओं ने जटाऊ शिव मंदिर का निर्माण करवाया।[२] हालांकि, इस जगह की स्‍थापना की असल तारीख और समय का अब तक पता नहीं चल पाया है। किवदंती है कि इस शहर का नाम यहां की स्‍थानीय जनजाति भील के नाम पर पड़ता है जिन्‍होंने 16वीं शताब्‍दी में अकबर के खिलाफ मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप की मदद की थी। तभी से इस जगह का नाम भीलवाड़ा पड़ गया। 1948 में राजस्थान का भाग बनने से पूर्व भीलवाड़ा भूतपूर्व उदयपुर रियासत का हिस्सा था। भीलवाङा का नामकरण भील राजा भलराज के नाम पर हुआ।

पर्यटन

थला की माता जी देवली भीलवाड़ा शहर से 15 किलोमीटर दूर बनास नदी के किनारे बहुत पुराना और विशाल बढ़ा देवी का मंदिर है यह बहुत विख्यात है यहां पर बारिश के मौसम में बड़ी संख्या में लोग घूमने के लिए आते हैं यहां पर नवरात्रा में रामायण वह बड़े-बड़े कलाकारों का ताता लगा रहता है वह अष्टमी के दिन बड़े मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें राष्ट्रीय स्तर केेे कलाकार आते है वह अष्टमी के दिन देवली मैं भव्य जुलूस निकलता है बाद में माता जी के यहां पर आते हैं यहां पर आने के लिए भीलवाड़ा से पुर देवली से 2 किलोमीटर है। [३]

चावण्डिया तालाब

भीलवाड़ा से 15 किलोमीटर कोटा रोड़ कि तरफ चावंडिया तालाब स्थित है जहां तालाब के मध्य माता चामुंडा का मंदिर स्थित है। यहां हर वर्ष अक्टूबर से मार्च के मध्य विदेशी प्रवासी पक्षी आते है और इसी कारण इसे पक्षी ग्राम के नाम से जाना जाता है।यह पर्यटकों और पक्षी प्रेमियों के लिए बहुत ही सुन्दर जगह है। हर वर्ष ज़िला प्रशासन और कुछ संस्थाओं के द्वारा हर वर्ष पक्षी महोत्सव का आयोजन किया जाता है जहां देश विदेश से पक्षी विशेषज्ञ पक्षी अवलोकन के लिए आते है।

दरगाह हजरत गुल अली बाबा

शहर के सांगानेरी गेट पर स्थित यह दरगाह आस्ताना हज़रत गुल अली बाबा रहमतुल्लाह अलेही के नाम से मशहूर है यहाँ सभी धर्मो के लोग आस्था रखते है दरगाह पर प्रति वर्ष 1 से 3 नवम्बर तक उर्स का आयोजन होता है जो बड़ी धूमधाम से मनाया जा[४] ता हैl दरगाह के पास ही एक विशाल मस्जिद भी स्थित है जो रज़ा मस्जिद के नाम से जानी जाती है इस मस्जिद में पांच हजार लोग एकसाथ नमाज अदा कर सकते है दरगाह के सामने ही सुव्यवस्थित ढंग से एक नगरी बसी हुई है जिसे गुल अली नगरी के नाम से जाना जाता है इस नगरी में कुल-दे-सेक- यानी वो गली जो आगे जाकर बंद हो जाति हे यहाँ की खास पहचान है आस्ताना गुल अली में ही एक दारुल उलूम भी संचालित है जिसका नाम सुल्तानुल हिन्द ओ रज़ा दारुल उलूम है इस दारुल उलूम में देश के कई राज्यों से आये बच्चे इल्म हासिल करते है

गाँधी सागर तालाब

यह तालाब शहर के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित है किसी ज़माने में यह लोगो के लिए प्रमुख पेयजल स्रोत हुआ करता था इस तालाब के मध्य में एक विशाल टापू स्थित है यह तालाब लोगो के लिए महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है इसके उत्तरी छोर पर एक तरफ तेजाजी का मंदिर और दूसरी तरफ बालाजी का मंदिर स्थित हे इस पर्यटन स्थल को विकसित करने के लिए इसके दक्षिणी किनारे पर एक मनोरम पार्क का निर्माण कराया गया है जिसका नाम तेजा पार्क रखा गया है बरसात के मोसम में इस तालाब से गिरते पानी का मनोरम दृश्य देखते ही बनता है [५]

हरणी महोदव

भीलवाड़ा से 6 किलोमीटर दूर मंगरोप रोड़ पर शिवालय है। जो कि हरणी महोदव के नाम से प्रसिद्ध है। जहां पर प्रत्‍येक शिवरात्रि पर 3 दिवसीय भव्‍य मेले का आयोजन होता है। मेले का आयोजना जिला प्रशासन द्वारा नगर परिषद के सहयोग से किया जाता है। जिसमें 3 दिन तक प्रत्‍येक रात्रि में अलग-अलग कार्यक्रम यथा धार्मिक भजन संध्‍या (रात्रि जागरण), कवि सम्‍मेलन व सांस्‍क़तिक संध्‍या का आयोजन किया जाता है। यह मन्दिर पहाड़ी की तलहटी पर स्थित है। प्राचीन समय में यहां घना आरण्‍य होने से आरण्‍य वन कहा जाता था, जिसका अपभ्रंश हो कर हरणी नाम से प्रचलित हो गया।

बदनोर

भीलवाडा शहर से 72 किलोमीटर दूर स्थित इस कस्बे का इतिहास में एक अलग ही महत्व हे जब मेड़ता के राजा जयमल ने राणा उदेसिंह से सहायता के लिए कहा तो राणा ने जयमल को बदनोर जागीर के रूप में दिया बदनोर में कई देखने योग्य स्थल हे उनमे से निम्न हे - छाचल देव। अक्षय सागर। जयमल सागर। बैराट मंदिर। धम धम शाह बाबा की दरगाह। आंजन धाम। केशर बाग़। जल महल। आदि

कोटडी

भीलवाडा शहर से 23 किलोमीटर दूर स्थित इस कस्बे का नाम आते ही सबसे पहले विख्यात श्री चारभुजा जी का मंदिर स्मृति में आता है। भीलवाडा-जहाजपुर रोड पर स्थित यह नगर भगवान के मंदिर के कारण काफी प्रसिद्ध है। सगतपुरा का देवनारायण मंदिर, पारोली में चंवलेश्वर मंदिर, मीराबाई का आश्रम व ढोला का सगस जी(भूत), कोठाज का श्री चारभुजा जी का मंदिर देखने योग्य हैं। आसोप के चारभुजा नाथ का मंदिर भी दर्शनीय है। देवनारायण जी का मन्दिर देवतालाई मे बना हुआ है जहाँ पर मूर्तियाँ अपने आप जमीन से बाहर निकली। इस मंदिर की यह खासियत है कि यह एक रात के अंदर ही बना है इसे कौन बनाया और किसने बनाया यह कहां से आया इसका इतिहास कोई नहीं जानता है वहां पर एक शिलालेख भी है लेकिन वहां पर जो लिखित भाषा है वह ग्रामीण और आसपास के लोगों को समझ में नहीं आती है जिसकी वजह से इसकी पूरी जानकारी नहीं है लोगों के पास ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर बहुत बड़ा बनने वाला था यहां पर Hindu Muslim Jain तीन सहेलियों का बना हुआ है यह मंदिर बहुत ही विख्यात है अभी न्यू रिसर्च के अंदर इसी गांव के अंदर सोने की माइंस का पता चला है जहां पर लगभग 576 टन सोने की पुष्टि हुई है तथा इसी तहसील के अंदर एक और विख्यात जगह जिसे भणाई की बावड़ी के नाम से जाना जाता है यह भूतिया बावड़ी के नाम से भी विख्यात है या फिर ऐसा माना जाता है कि यहां पर पूरी की पूरी बारात समा गई इसके अंदर 300 से अधिक कमरे हैं और सारे कमरे एक भूलबलाई से कम नहीं है इस बावड़ी का निर्माण किसने करा इसे किसने बनाया यह आज तक एक रहस्य बना हुआ है यह बावड़ी बहुत ही पुरानी है ऐसा माना जाता है कि यहां एक पहले शहर बसा हुआ करता था जिसे दरिबो के शहर के नाम से जाना जाता था 1921 में बसा गुर्जरों का गढ़ सरकाखेड़ा गांव भी कोटडी में है यह गांव एकता और पराक्रम रिता के नाम से जाना जाता है यहां पर हर्षल गोत्र और एक ही समाज (गुर्जर) के लोग रहते हैं यहां पर आराध्य देवी सती माता का एक भव्य मंदिर भी है जिसका निर्माण हर्षल गोत्र (गुर्जर) के लोगों ने करवाया यह यहां की कुलदेवी मानी जाती है इसी गांव में ऐतिहासिक मंदिर है खखेड़ बाप जी का ऐसा माना जाता है कि यह दो भाई थे इन दोनों पर की यही खासियत थी कि यह रात के अंदर खड़े-खड़े ही नींद निकालते थे और इनका यही गांव था इनके पास बहुत सारी गाय और पशु थे इनके पास गाय और भैंसों का काफी काफिला था तो 1 दिन की बात है कुछ चोर इनकी गायों को चोरी करने के लिए आए बट यह चीज देख कर के हैरान हो गए की रात के अंदर भी रात के अंदर भी वह नहीं सो रहे थे चोरों को ऐसा लगा बट ऐसा नहीं था वह खड़े-खड़े नींद निकालने में विख्यात है और यह बात चोरों को पता नहीं थी तो चोर एक दिन साधारण व्यस्त बदल कर के उनके घर आए और उनकी मां से उनका सारा रहस्य जाना उनकी मां ने उनको सारा भेद बता दिया और कहा कि है ऐसे ही सोते सोते हैं नींद निकालते उनकी मां को क्या पता था कि यही लोग हमारी पैसों को चुरा कर के ले जाएंगे एक रात वह चौरआए और वहां से गाय और भेस चुरा कर ले जाने लगे और वह सो रहे हैं उनकी गर्दन काट दी फिर वहां ऐसा चमत्कार हुआ उनकी गर्दन धड़ से कट करके अलग हो गई फिर भी उनका दर्द लड़ता रहा और उन चोरों को खत्म कर दिया ऐसा इतिहास पुणे एक गांव है

बनेड़ा

यह भीलवाडा जिले का सबसे पुराना शहर हे बनेड़ा में दुर्ग हे, जो महाराजा सरदार सिंह ने बनवाया था। ये ऐक तहसील व् उपखंड कार्यालय है यह ऐक ऐतिहासिक सत्र हे सबसे पुराना जेन मंदिर हे व् बहुत बड़ा दुर्ग के परकोटा बना हुआ है।

मेनाल

माण्डलगढ से 20 किलोमीटर दूर चितौडगढ की सीमा पर स्थित पुरातात्विक एवं प्राकृतिक सौन्दर्य स्थल मेनाल में 12 वीं शताब्दी के चौहानकला के लाल पत्थरों से निर्मित महानालेश्वर मंदिर, रूठी रानी का महल, हजारेश्वर मंदिर देखने योग्य हैं। सैकडों फीट ऊंचाई से गिरता मेनाली नदी का जल प्रपात भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केन्द्र हैं।

जहाजपुर

भीलवाडा का प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल, जिसका इतिहास बड़ा रंगबिरंगा रहा हैं। कर्नल जेम्स टॉड 1820 में उदयपुर जाते समय यहाँ आये थे। यहाँ का बड़ा देवरा (पुराने मंदिरों का समूह), पुराना किला और गैबीपीर के नाम से प्रसिद्ध मस्जिद दर्शनीय हैं।यहा पर जैन धर्म का मंदिर भी है जो स्वस्तिधाम के नाम से जाना जाता हे इस मंदिर श्री मुनि सुवर्तनाथ की प्राकट्य प्रतिमा है जो बहुत अदभुद हे यह प्रतिमा चमत्कारी है यह मंदिर शाहपुरा रोड पर स्थित है|जहाजपुर से 12 किलोमीटर दूर श्री घटारानी माता जी का मंदिर है जो अतिसुन्दर व् दर्शनीय है तथा इस मंदिर से 2 किलोमीटर दूर पंचानपुर चारभुजा का प्राकट्य स्थान मंदिर है|जहाजपुर क्षेत्र में एक नागदी बांध है जो अतिसूंदर व् आकर्षक है यहाँ एक नदी भी हे जिसे नागदी नदी के नाम से जाना जाता हैं इसे जहाजपुर की गंगा भी कहते है| जहाजपुर में देखने के लिए अनेको मंदिर व् धर्मस्तल है| जहाजपुर की भाषा व् जीवन शैली अदभुद है|

बिजोलिया

माण्डलगढ से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित बिजौलिया में प्रसिद्ध मंदाकिनी मंदिर एवं बावडियाँ स्थित हैं। ये मंदिर 12 वीं शताब्दी के बने हुए हैं। लाल पत्थरों से बने ये मंदिर पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व के स्थल इतिहास प्रसिद्ध किसान आन्दोलन के लिए भी बिजौलियाँ प्रसिद्ध रहा हैं। यहाँ पर बना भूमिज शैली का विष्णु भगवान का मंदीर 1000 वर्ष सै भी पुराना है , जो भीलवाडा का एक मात्र मंदिर है। यहा बिजोलिया अभिलेख हैं जिससे चौहानो की जानकारी मिलती हैं व इसमे चौहनो को ब्राह्मण बताया गया हैं

शाहपुरा

भीलवाडा तहसील मुख्यालय से 50 किलोमीटर पूर्व में शाहपुरा राज्य की राजधानी था। यहाँ रेल्वे स्टेशन नहीं ह परन्तु यह सडक मार्ग द्वारा जिला मुख्यालय से जुडा हुआ हैं। यह स्थान रामस्नेही सम्प्रदाय के श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल हैं। मुख्य मंदिर रामद्वारा के नाम से जाना जाता हैं। यहाँ पूरे भारत से और बर्मा तक तक से तीर्थ यात्री आते हैं। यहाँ लोक देवताओं की फड पेंटिंग्स भी बनाई जाती हैं। यहाँ प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी केसरसिंह बारहठ की हवेली एक स्मारक के रूप में विद्यमान हैं। यहाँ होली के दूसरे दिन प्रसिद्ध फूलडोल मेला लगता हैं, जो लोगों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र होता हैं। यहाँ शाहपुरा से 30 किलो मीटर दूर धनोप माता का मंदिर भी हे और खारी नदी के तट पर शिव मंदिर छतरी भी लोगों को काफी पसंद हे

माण्डल

भीलवाडा से 14 किलोमीटर दूर स्थित माण्डल कस्बे में प्राचीन स्तम्भ मिंदारा पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। यहाँ से कुछ ही दूर मेजा मार्ग पर स्थित प्रसिद्ध जगन्नाथ कछवाह की बतीस खम्भों की विशाल छतरी ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व का स्थल हैं। छह मिलोकमीटर दूर भीलवाडा का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मेजा बांध हैं। होली के तेरह दिन पश्चात रंग तेरस पर आयोजित नाहर नृत्य लोगों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र होता हैं। कहते हैं कि शाहजहाँ के शासनकाल से ही यहाँ यह नृत्य होता चला आ रहा हैं। यहां के तालाब के पाल पर प्राचीन शिव मंदिर स्थित है। जिसे भूतेश्‍वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

माण्डलगढ

भीलवाडा से 51 किलोमीटर दूर माण्डलगढ नामक अति प्राचीन विशाल दुर्ग ह। त्रिभुजाकार पठार पर स्थित यह दुर्ग राजस्थान के प्राचीनतम दुर्गों में से एक हैं। यह दुर्ग बारी-बारी से मुगलों व राजपूतों के आधिपत्य में रहा हैं।

अन्य स्थल

  • भीलवाडा-उदयपुर मार्ग पर 45 मिलोमीटर दूर गगापुर में गंगाबाई की प्रसिद्ध छतरी पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक दष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इस छतरी का निर्माण सिंधिया महारानी गंगाबाई की याद में महादजी सिंधिया ने करवाया था।
  • भीलवाड से 55 किलोमीटर दूर खारी नदी के बायें किनारे पर स्थित भीलवाडा का एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल। राजस्थान के लोक देवता देवनारायण जी का यह तीर्थ स्थल ह और इनका यहाँ एक भव्य मंदिर स्थित हैं। इसे इसके निर्माता भोजराव के नाम पर सवाईभोज कहते हैं।

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

  1. स्क्रिप्ट त्रुटि: "citation/CS1" ऐसा कोई मॉड्यूल नहीं है।
  2. साँचा:http://www.tourism.rajasthan.gov.in/hi/bhilwara.html
  3. स्क्रिप्ट त्रुटि: "citation/CS1" ऐसा कोई मॉड्यूल नहीं है।
  4. साँचा:cite news
  5. साँचा:cite news