ऊष्मामापी

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ऊष्मामापी की संरचना :
1. तापमापी
2. विडोलक (stirrer)
3. ढक्कन
4. अन्दर वाला पात्र
5. बाहरी पात्र
6. ऊष्मा के कुचालक के बने सपोर्ट (आधार)

ऊष्मामापी या कैलोरीमीटर एक वैज्ञानिक उपकरण है जो ऊष्मामिति में सहायक है। इसका उपयोग रासायनिक अभिक्रियाओं की ऊष्मा मापने, या भौतिक परिवर्तनों की ऊष्मा मापने या ऊष्मा धारिता मापने के लिये किया जाता है। डिफरेंशियल स्कैनिंग कैलोरीमीटर, आइसोथर्मल माइक्रोकैलोरीमीटर, टाइट्रेशन कैलोरीमीटर तथा त्वरित दर कैलोरीमीटर आदि प्रमुख ऊष्मामापी हैं।

किसी धातु के एक बर्तन में निश्चित द्रव्यमान का जल भरकर तथा एक तापमापी लगाकर दहन कक्ष के ऊपर लगा देने से एक सरल ऊष्मामापी बन जाता है।

परिचय

उष्मामापन के प्रयोगों का मुख्य उपकरण ताँबे, पीतल अथवा चाँदी की पतली चद्दर का बना उष्मामापी होता है। यह एक बड़े बर्तन के भीतर कुचालक आधारों पर रखा जाता है। उष्मामापी में मापे हुए द्रव्यमान का जल भरा होता है, जिसमें निश्चित ताप की तप्त वस्तु डाली जाती है तथा एक सूक्ष्म तापमापी से तापपरिवर्तन पढ़ा जाता है। जल को चलाने के लिये उसमें ताँबे का मुड़ा हुआ विचालक (stirrer) रहता है। विकिरण द्वारा उष्मा का क्षय दूर अथवा कम करने के लिए उष्मामापी के बाहरी तल तथा बड़े बर्तन के भीतरी तल पर पालिश की जाती है।

किसी तप्त पदार्थ को उष्मामापी के जल में डालने पर जल के अतिरिक्त उष्मामापी, विचालक तथा तापमापी का पारा भी तप्त पदार्थ की उष्मा लेते हैं तथा उनके ताप में भी वृद्धि होती है। अत: इनकी उष्माधारिताओं का लेखा लेना भी आवश्यक है। तापांतर की वृद्धि से विकिरण शोधन में भी वृद्धि होती है; इस कारण उचित यह है कि उष्मामापी में जल की मात्रा इतनी अधिक ली जाए कि ताप में अधिक वृद्धि न हो; परंतु ऐसा करने से प्रयोग की सूक्ष्मता (precision) घट जाती है। इसके प्रतिकार के लिए सूक्ष्म तापमापी का व्यवहार आवश्यक हो जाता है।

इन्हें भी देखें

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