जंतर मंतर, मथुरा

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'यंत्र प्रकार' तथा 'सम्राट सिद्धांत' जैसे ग्रंथों की रचना द्वारा राजा जय सिंह तथा उनके राजज्योतिषी पं॰ जगन्नाथ ने इस विज्ञान के प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दिया। इन्होने अपनी देख-रेख में 5 वेधशालाएं- दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में स्थापित करायीं। जय सिंह ने भारतीय खगोलविज्ञान को यूरोपीय विचारधारा से भी जोड़ा. अतः यह कहना उचित होगा की जयसिंह की वेधशालाएं ही भारत में भविष्य के तारामंडल की आधार बनीं. इस प्रकार पाषाण संरचनाओं से वेधशाला और वेधशालाओं से तारामंडलों का एक चक्र पूर्ण हुआ।

मथुरा की वेधशाला १८५० के आसपास ही नष्ट हो चुकी थी।