गंगा सिंह

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
imported>Hemant Shesh द्वारा परिवर्तित ०४:५६, १८ मार्च २०२२ का अवतरण (→‎कुलगुरु-सम्मान)
(अन्तर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अन्तर) | नया अवतरण → (अन्तर)
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ


साँचा:infobox


राजस्थानी राजपूतों के प्रसिद्ध राठौड़ वंश में जन्मे गंगासिंह (13 अक्टूबर 1880, बीकानेर – 2 फरवरी 1943, बम्बई) १८८८ से १९४३ तक बीकानेर रियासत के भूतपूर्व महाराजा थे। उन्हें अपने राज्य के एक आधुनिक सुधारवादी भविष्यदृष्टा किन्तु साथ ही एक विवादस्पद राजा के रूप में याद किया जाता है।[१] पहले महायुद्ध के दौरान ‘ब्रिटिश इम्पीरियल वार केबिनेट’ के वह अकेले गैर-अँगरेज़ सदस्य थे। [२]

जन्म

बीकानेर के महाराजा लाल सिंह की तीसरी सन्तान गंगा सिंह का जन्म १३ अक्तूबर १८८० को हुआ था। डूंगर सिंह उनके बड़े भाई थे जिनके देहान्त के बाद १८८७ ईस्वी में १६ दिसम्बर को वे बीकानेर-नरेश बने।

शिक्षा और सैन्य-प्रशिक्षण

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पंडित रामचंद्र दुबे से प्राप्त की। मेयो कॉलेज, अजमेर में उन्होंने निजी तौर पर शिक्षा प्राप्त की, जहाँ बोर्डिंग में रह कर उन्होंने 5 साल तक स्कूली अध्ययन किया। बाद में, उन्हें सर ब्रायन एगर्टन द्वारा भी पढ़ाया गया, जिन्होंने उन्हें प्रशासनिक प्रशिक्षण भी प्रदान किया। इस तरह उनकी प्रारंभिक शिक्षा पहले घर ही में, फिर बाद में अजमेर के मेयो कॉलेज में १८८९ से १८९४ के बीच हुई। ठाकुर लाल सिंह के मार्गदर्शन में १८९५ से १८९८ के बीच इन्हें प्रशासनिक प्रशिक्षण मिला। १८९८ में गंगा सिंह फ़ौजी-प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए देवली रेजिमेंट भेजे गए जो तब ले.कर्नल बैल के अधीन देश की सर्वोत्तम मिलिट्री प्रशिक्षण रेजिमेंट मानी जाती थी।[३]

विवाह और परिवार

इनका पहला विवाह प्रतापगढ़ राज्य की बेटी वल्लभ कँवर से १८९७ में, और दूसरा विवाह बीकमकोर की राजकन्या भटियानी अजब कँवर से हुआ जिनसे इनके दो पुत्रियाँ और चार पुत्र हुए|

संतानें

नाम उपाधि जन्म निधन टिप्पणी
Ram Singh Maharajkumar of Bikaner 30 June 1898 30 June 1898 Born to Maharani Ranawatiji; died within hours of birth
Chand Kanwar Maharajkumari of Bikaner 1 July 1899 31 July 1915 Born to Maharani Ranawatiji; died of tuberculosis at the Bhowali sanatorium aged 16
Sadul Singh Yuvaraj of Bikaner, later His Highness the Maharaja Sahib of Bikaner. 7 September 1902 25 September 1950 Born to Maharani Ranawatiji. Succeeded his father as Maharaja of Bikaner. Reigned from 02 February 1943 until his death in 1950.[४]
Bijey Singh Maharajkumar of Bikaner, later Maharaj of Chhatargarh 28 March 1909 11 February 1932 Born to Maharani Bhatianiji. Selected to succeed to the estates of his natural grandfather (Ganga Singh's biological father), Maharaj Shri Lal Singh.
Veer Singh Maharajkumar of Bikaner 7 October 1910 27 March 1911 Born to Maharani Bhatianiji. Died in infancy.
Shiv Kanwarji
  • 1916 – 1930: Maharajkumari of Bikaner
  • 1930 – 1940: Yuvarani of Kotah
  • 1940 – 1991: Maharani of Kotah
  • 1991 – : Rajmata of Kotah
1 March 1916 12 January 2012 Born to Maharani Bhatianiji. Given in marriage to the future Maharaja Bhim Singh II of Kotah in April 1930, aged 14.

कार्यक्षेत्र

गंगासिंह अपने पुत्र सदल के साथ (सन १९१४ में)

पहले विश्वयुद्ध में एक फ़ौजी अफसर के बतौर गंगासिंह ने अंग्रेजों की तरफ से ‘बीकानेर कैमल कार्प्स’ के प्रधान के रूप में फिलिस्तीन, मिश्र और फ़्रांस के युद्धों में सक्रिय हिस्सा लिया। १९०२ में ये प्रिंस ऑफ़ वेल्स के और १९१० में किंग जॉर्ज पंचम के ए डी सी भी रहे।[५]

महायुद्ध-समाप्ति के बाद अपनी पुश्तैनी बीकानेर रियासत में लौट कर उन्होंने प्रशासनिक सुधारों और विकास की गंगा बहाने के लिए जो-जो काम किये वे किसी भी लिहाज़ से साधारण नहीं कहे जा सकते| १९१३ में उन्होंने एक चुनी हुई जन-प्रतिनिधि सभा का गठन किया, १९२२ में एक मुख्य न्यायाधीश के अधीन अन्य दो न्यायाधीशों का एक उच्च-न्यायालय स्थापित किया और बीकानेर को न्यायिक-सेवा के क्षेत्र में अपनी ऐसी पहल से देश की पहली रियासत बनाया। अपनी सरकार के कर्मचारियों के लिए उन्होंने ‘एंडोमेंट एश्योरेंस स्कीम’ और [[जीवन-बीमा योजना]] लागू की, निजी बेंकों की सेवाएं आम नागरिकों को भी मुहैय्या करवाईं, और पूरे राज्य में बाल-विवाह रोकने के लिए शारदा एक्ट कड़ाई से लागू किया! १९१७ में ये ‘सेन्ट्रल रिक्रूटिंग बोर्ड ऑफ़ इण्डिया’ के सदस्य नामांकित हुए और इसी वर्ष उन्होंने ‘इम्पीरियल वार कांफ्रेंस’ में, १९१९ में ‘पेरिस शांति सम्मलेन’ में और ‘इम्पीरियल वार केबिनेट’ में भारत का प्रतिनिधित्व किया। [६] १९२० से १९२६ के बीच गंगा सिंह ‘इन्डियन चेंबर ऑफ़ प्रिन्सेज़’ के चांसलर बनाये गए। इस बीच १९२४ में ‘लीग ऑफ़ नेशंस’ के पांचवें अधिवेशन में भी इन्होंने भारतीय प्रतिनिधि की हैसियत से हिस्सा लिया।[७]

मानद-सदस्यताएं

ये ‘श्री भारत धर्म महामंडल’ और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संरक्षक, [८] ‘रॉयल कोलोनियल इंस्टीट्यूट’ और ‘ईस्ट इण्डिया एसोसियेशन’ के उपाध्यक्ष, ‘इन्डियन आर्मी टेम्परेन्स एसोसियेशन’ ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ लन्दन की ‘इन्डियन सोसाइटी’इन्डियन जिमखाना’ मेयो कॉलेज, अजमेर की जनरल कांसिल, ‘इन्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट’ जैसी संस्थाओं के सदस्य और, ‘इन्डियन रेड-क्रॉस के पहले सदस्य थे|[९]

प्रमुख प्रशासनिक योगदान

उन्होंने १८९९-१९०० के बीच पड़े कुख्यात ‘छप्पनिया काल’ की ह्रदय-विदारक विभीषिका देखी थी, सन 1899 में उत्तर भारत में भयंकर अकाल पड़ा था. इनमें सबसे प्रमुख राजस्थान था. राजस्थान के जयपुर, जोधपुर नागौर चुरू और बीकानेर इलाक़े भयंकर तरीक़े से सूखे की चपेट में आये थे. ये अकाल विक्रम संवत 1956 में होने के कारण इसे स्थानीय भाषा में 'छप्पनिया अकाल' भी कहा जाता है. अंग्रेज़ों के गज़ेटियर में ये अकाल 'द ग्रेट इंडियन फ़ैमीन 1899' के नाम से दर्ज है.

चित्र:वह अकाल छप्पन का.jpg
संवत १९५६ में पड़े भीषण अकाल के दौरान एक मजदूर राजस्थानी परिवार

तभी गंगा सिंह अपनी रियासत के लिए पानी का इंतजाम एक स्थाई समाधान के रूप में करने का संकल्प लिया था और इसीलिये सबसे क्रांतिकारी और दूरदृष्टिवान काम, जो इनके द्वारा अपने राज्य के लिए किया गया वह था- किसी भी कीमत पर पडौसी पंजाब की सतलज नदी का पानी ‘गंग-केनाल’ के ज़रिये बीकानेर जैसे सूखे क्षेत्र तक लाना और नहरी सिंचित-क्षेत्र में किसानों को खेती करने और बसने के लिए मुफ्त ज़मीनें देना।

श्रीगंगानगर शहर के विकास को भी उन्होंने प्राथमिकता दी । वहां कई निर्माण करवाए और बीकानेर में अपने निवास के लिए पिता लालसिंह के नाम से ‘लालगढ़ पैलेस’ बनवाया। बीकानेर को जोधपुर शहर से जोड़ते हुए रेलवे के विकास और बिजली लाने की दिशा में भी ये बहुत सक्रिय रहे। जेल और भूमि-सुधारों की दिशा में भी इन्होंने नए कायदे कानून लागू करवाए, नगरपालिकाओं के स्वायत्त शासन सम्बन्धी चुनावों की प्रक्रिया शुरू की, और राजसी सलाह-मशविरे के लिए एक मंत्रिमंडल का गठन भी किया। १९३३ में लोक देवता रामदेवजी की समाधि पर एक पक्के मंदिर के निर्माण का श्रेय भी इन्हें है!

सार-संक्षेप में उनके मुख्य योगदानों को यों क्रमबद्ध किया जा सकता है -

  • गंगा सिंह ने गंगा नहर का निर्माण किया। उन्होंने लोगों को इस नए कमांड क्षेत्र में बसने के लिए प्रेरित किया। पंजाब के आसपास के इलाकों से एक बड़ी आबादी वहां बस गई। उनमें से ज्यादातर भूमि मालिक सिख परिवार 1920 के दशक में इस क्षेत्र में आ गए थे, जब नहर का निर्माणबीकानेर राज्य के पूर्व महाराजा गंगा सिंह द्वारा किया गया था, जो पंजाब में आसपास के फ़िरोज़पुर जिला सेसतलुज नदी का पानी बीकानेर लाए। । पुराने बीकानेर राज्य के तहत कुछ कस्बों को छोड़ कर इस क्षेत्र में कोई स्थायी बस्तियां नहीं थीं।
  • उन्होंने इस क्षेत्र में वर्ष 1899-1900 ईस्वी के सबसे भीषण अकाल से सफलतापूर्वक सामना किया । इस अकाल ने युवा महाराजा को इस समस्या से स्थायी रूप से छुटकारा पाने के लिए एक सिंचाई प्रणाली स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।
  • उन्होंने श्री गंगानगर शहर और उसके आसपास के क्षेत्र को राजस्थान के सबसे उपजाऊ अन्न क्षेत्र के रूप में विकसित किया।
  • उन्होंने 1902 और 1926 के बीच बीकानेर (अपने पिता लाल सिंह की याद में) में लालगढ़ पैलेस का भी निर्माण किया।
  • वह अपने राज्य में रेलवे और बिजली भी लाए।
  • उन्होंने जेल सुधारों की शुरुआत की। बीकानेर जेल के कैदी बेहतरीन परंपरागत कालीन बुनते थे जो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचे जाते थे।
  • उन्होंने नगर पालिकाओं जैसी आंशिक आंतरिक लोकतंत्र संस्थाओं की स्थापना की और सहायता और सलाह के लिए एक मंत्रिपरिषद की नियुक्ति की।
  • उनकी पहल पर कुछ ज़रूरी भूमि-सुधार भी किए गए।
  • उन्होंने अपने राज्य में नए उद्यम शुरू करने के लिए पड़ोसी राज्य के उद्यमी उद्योगपतियों और कृषकों को खुद प्रेरित किया।
  • उन्होंने रामदेव पीर के समाधि के ऊपर रामदेवरा में मौजूदा मंदिर का निर्माण वर्ष 1931 में करवाया था।
  • महिलाओं के लिए कई स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना की।
  • उन्होंने देशनोक में करणी माता मंदिर के मुख्य द्वार के रूप में उपयोग किए जाने वाले ठोस चांदी के भारी दो अलंकृत द्वार दान में दिए।

सम्मान

सन १८८० से १९४३ तक इन्हें १४ से भी ज्यादा कई महत्वपूर्ण सैन्य-सम्मानों के अलावा सन १९०० में ‘केसरेहिंद’ की उपाधि से विभूषित किया गया। १९१८ में इन्हें पहली बार 19 तोपों की सलामी दी गयी, वहीं १९२१ में दो साल बाद इन्हें अंग्रेज़ी शासन द्वारा स्थाई तौर 19 तोपों की सलामी योग्य शासक माना गया।[१०]

(Ribbon bar, as it would look today; UK decorations only)

Ord.Stella.India.jpg Order of the Indian Empire Ribbon.svg Royal Victorian Order ribbon sm.jpg Order of the British Empire (Military) Ribbon.png

Order of the Bath UK ribbon.png Kaisar-i-Hind Medal.gif Order of St John (UK) ribbon.png Third China War Medal BAR.svg

1914 Star BAR.svg British War Medal BAR.svg Victory Medal MID ribbon bar.svg India Service Medal BAR.svg

39-45 Star BAR.svg Africa Star BAR.svg War Medal 39-45 BAR.svg King Edward VII Coronation Medal (Military) ribbon.png

Med.DelhiDurbar1903.png King George V Coronation Medal ribbon.png GeorgeVSilverJubileum-ribbon.png GeorgeVICoronationRibbon.png


ब्रिटिश सम्मान और उपाधियाँ आदि

कुलगुरु-सम्मान

राजा बनने के बाद इन्होने अपने पूर्वजों की परंपरा का निर्वाह करते हुए जाने-माने तांत्रिक-विद्वान असाधारण शिवानन्द गोस्वामी के उन दाक्षिणात्य आत्रेय वंशजों को अपने कुल-गुरु के रूप में सम्मान दिया जो इनके पितामह और अन्य पूर्वज बीकानेर राजाओं के शासन काल में १७ वीं सदी और उसके बाद कुलगुरु के बतौर आमंत्रित किये गए थे। जैसे : शिवानन्द गोस्वामी के वंशज विद्वान जागेश्वर गोस्वामी इनके व्यक्तिगत स्टाफ में नियुक्त थे। बीकानेर राज्य में आत्रेय वंश ही के अनेक मेधावी सदस्यों को इनके शासन में कई महत्वपूर्ण पद सौंपे गए। अपने जन्मदिन पर अपने वजन के बराबर सोने चांदी और बहुमूल्य जवाहरातों से तुल कर उसे गुरु-दक्षिणा में अपने कुलगुरु को भेंट में देने की परंपरा का पालन भी अनेक वर्ष तक गंगा सिंह ने किया ।[१२][१३][१४] उन्होंने अपने कुलगुरु-वंश के कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को समय पर मैडल और पुरस्कार दिए जिन में दूसरे महायुद्ध के दौरान की गयी सिविल सप्लाई के क्षेत्र में असाधारण सेवाओं के लिए बीकानेर में नागरिक आपूर्ति / फोरेन एंड पोलिटिकल विभाग के वरिष्ठ पंडित फाल्गुन गोस्वामी और उनके सहयोगी तुलेश्वर गोस्वामी को गंगा सिंह रजत मैडल दिया गया था ।

गंगा सिंह मैडल

इसी तरह जब कल्याण कल्पतरु के यशस्वी संपादक पंडित चिम्मन लाल गोस्वामी ने एम ए की परीक्षा में अंग्रेज़ी साहित्य और संस्कृत दोनों में उच्चतम अंक ले कर काशी विश्वविद्यालय का गोल्ड मैडल प्राप्त किया और जब वह पढाई पूरी कर बीकानेर, अपने घर लौटे तो उन्हें स्टेशन से सम्मानपूर्वक लिवा लाने के लिए महाराजा ने रत्नजडित सजा-धजा हाथी भेजा था ! [१५]

महाराजा का दूसरा चेहरा

महाराजा गंगासिंह का चरित्र बड़ा विरोधाभासी है। अगर वह अपने राज्य के सबसे बड़े हितचिन्तक थे तो दूसरी ओर उनके अनेक मौलिक योगदानों और पहलों के बावजूद कुछ लोग उन्हें मनमौजी, निहायत अलोकतांत्रिक, घोर सुधार-विरोधी, स्वाधीनता आंदोलनों को कुचलने वाले, जनता पर तरह-तरह के टेक्स लगाने वाले अंगरेज़परस्त और बीकानेर राज्य से आर्य समाज और प्रजा परिषद के सदस्यों को देश निकाला देने वाले, गुस्सैल शासक गंगासिंह के रूप में भी याद करते हैं। जनरल गंगासिंह के पक्ष में जितनी बातें स्थानीय इतिहास में लिखी मिलती हैं- उतनी ही उनके विपक्ष में भी| बीकानेर में स्वाधीनता-सेनानियों, कांग्रेस से जुड़े पुराने नेताओं और प्रजामंडल जैसे आन्दोलनों को कुचलने वाले इस असाधारण राजा के बारे में खुली निंदा से भरे इतिहास के पृष्ठ भी लिखे गए हैं! १९२१ में प्रिंस ऑफ़ वेल्स के बीकानेर आगमन पर आयोजित समारोह में खादी की टोपी लगाने वाले दो छात्रों को बीकानेर पुलिस ने डंडों से पीट डाला था [१६]

एक ही उदाहरण शायद काफी हो- राजस्थान सरकार द्वारा संस्थापित 'राजस्थान स्वर्ण जयन्ती समारोह समिति' की इत्तिहास-पुस्तक 'रियासती राजपूताना से जनतांत्रिक राजस्थान' नामक ग्रन्थ में लेखक-संचयनकर्ता कन्हैया लाल कोचर ने पृष्ठ १२ पर बीकानेर में धारा-सभा शीर्षक से साफ़ सब्दों में लिखा है- "बीकानेर के राजा गंगा सिंह ने अपनी रियासत में १९१३ में ही धारा सभा की स्थापना कर इस दिशा में पहल करने का श्रेय प्राप्त कर लिया था | लेकिन यह धारा सभा वास्तव में एक छलावा थी क्यों कि इसमें जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों का कोई प्रावधान ही नहीं था "[१७]

चित्र:कन्हैया लाल कोचर की पुस्तक का आवरण.jpg
कन्हैया लाल कोचर की पुस्तक का आवरण

इसी तरह अन्य पुस्तकों में भी यह लिखा मिलता है-

(उद्धरण आरम्भ) " बीकानेर के महाराजा गंगासिंह एक प्रतिक्रियावादी व निरंकुश शासक थे! 1931 में स्थापित 'नरेंद्र मंडल' के संस्थापकों में से थे- बीकानेर क्षेत्र के प्रारंभिक नेता कन्हैया लाल व स्वामी गोपाल दास, इन्होने 1907 में चूरु में सर्व हितकारिणी सभा की स्थापना की थी| यह एक सामाजिक शैक्षणिक संस्था और किसी हद तक अराजनीतिक संस्था ही थी | सर्व हितकारिणी सभा ने सब से पहले चुरू में लड़कियों की शिक्षा हेतु एक पाठशाला खोली और अनुसूचित जाति के छात्रों की मुफ्त शिक्षा के लिए 'कबीर पाठशाला' स्थापित की पर जब बीकानेर में अन्य जगहों पर भी ऐसे स्कूल खुलने लगे, महाराजा गंगा सिंह इस रचनात्मक कार्य तक के प्रति भी आशंकित हो उठे और इस सभा की स्थापना को बीकानेर राज्य के विरुद्ध संगठित षड्यंत्र बता कर उन्होंने संस्था को ही प्रतिबंधित कर दिया | इस तरह यों तो बीकानेर में राष्ट्रीय चेतना/ राजनीतिक चेतना महाराजा गंगा सिंह के शासन काल में प्रारंभ हो गई थी पर वह अपनी रियासत में बीकानेर में राष्ट्रीय विचारों खास तौर पर स्वाधीनता संबंधी मांगों को पनपने देना ही नहीं चाहते थे ![१८] (उद्धरण समाप्त)

महाराजा गंगा सिंह द्वारा जहां अपनी जनता को सुखी बनाने के लिए कई प्रयास किए गए वहीं इन का दूसरा पहलू बहुत ही शर्मनाक था| अपने राज्य में इन्होने सारे राजनीतिक आंदोलनों को पूरी तरह से कुचला | सुखबीर सिह गहलोत ने लिखा है कि जब यहाँ भी दूसरे प्रांतों से असहयोग आंदोलन की हवा आने लगी और जनता में रियासती शासन के प्रति असंतोष फैलने लगा तो महाराजा ने 4 जुलाई 1932 से बीकानेर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम लागू कर दिया|[१९] कई अखबारों और किताबों को प्रतिबंधित किया गया - [२०] के अनुसार " पूर्ववर्ती बीकानेर राज्य की होम डिपार्टमैंट की तत्कालीन पत्रावलियों का अवलोकन करने पर कतिपय महत्वपूर्ण तथ्यात्मक जानकारियां मिलती हैं, तदनुसार, बीकानेर पब्लिक सेफ्टी एक्ट, 1932 की धारा-16 के तहत बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री की दिनांक 27 जुलाई, 1936 की आज्ञा से निम्नांकित समाचार पत्रों के बीकानेर राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया- (1) राजस्थान हिंदी साप्ताहिक, प्रकाशक व संपादक, रिषीदत्त नित्यानंद मेहता (राजस्थान प्रेस, ब्यावर) (2) रियासत उर्दू साप्ताहिक, संपादक व प्रकाशक, गफ्फार अहमद (रनजीत ताजाली और जयद्ध प्रेस, दिल्ली) (3) लोकमान्य हिंदी दैनिक, संपादक व प्रकाशक, एम.एन चौधरी, (लोकमान्य प्रेस, 160, हरिसन रोड, कलकत्ता)(4) अखंड भारत, हिंदी दैनिक, संपादक जयनारायण व्यास व काशी प्रताप सिंह, प्रकाश कन्हैयालाल दौलत राम वैद (फैडरल प्रिंटिंग प्रेस, नौ बैंक हाउस लेन, बंबई)। इनमें से ‘राजस्थान’ और ‘लोकमान्य’ के साथ ‘प्रिंसली इंडिया’, संपादक व प्रकाशक पी. गोपाल पिलेय (प्रिंसली इंडिया प्रेस, दिल्ली) पर तो सन् 1934 में ही बीकानेर राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसी प्रकार, कोटा से सन् 1940 में प्रकाशित होने वाले ‘दीनबंधू’ हिंदी साप्ताहिक, संपादक नाथूलाल जैन पर भी राज्य में प्रतिबंध लगा दिया गया था। ये सभी समाचार पत्र ऐसे थे जो राष्ट्रीय भावनाएं जगाने वाले समाचार तथा आलेख प्रकाशित करने और राजशाही के जोर-जुल्म का कच्चा चिट्‌ठा खोलने की मुहिम में लगे हुए थे। "

यह अधिनियम मार्शल लॉ की ही तरह कठोर कानून था | शारंगधर दास ने लिखा है कि रियासत में नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन इस सीमा तक प्रबल था कि लोग तब जेल में ठूंस दिए जाने के डर से बस कानाफूसी में बात किया करते थे| बीकानेर की पूरी रियासत जिससे जैसे एक जेलखाना सा बन गयी थी | 1920 में बीकानेर में सदविद्या प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई इस संस्था का उद्देश्य था- रिश्वतखोरी और अन्याय के विरुद्ध अभियान चलाना | 'महकमा खास' बीकानेर की रिपोर्ट में लिखा गया कि इस संस्था में राज्य में धर्म विजय और सत्य विजय नामक दो राजनैतिक दृष्टि से लिखे व्यंग्य नाटक मंचित किए थे इन नाटको से समस्त सरकारी क्षेत्र में हलचल मच गई थी|

26 जनवरी 1930 को चूरू में धर्मस्तूप पर महंत गणपति दास, चंदन मल बहड़, वेदशांत शर्मा द्वारा तिरंगा झंडा फहराने [२१] [२२] पर महाराजा ने महंत से मंदिर ही राज्य के पक्ष जप्त कर लिया: पंडित मदन मोहन मालवीय और घनश्याम दास बिड़ला के हस्तक्षेप पर महाराजा ने यह मंदिर पुन: खोल तो दिया पर नियंत्रण अपने मर्जीदान नगरपालिका चुरू के एक सदस्य को सौंप दिया| महाराजा की स्वेच्छाचारिता पर प्रकाश डालते हुए विजयसिंह मोहता ने ‘बीकानेर राज्य में नादिरशाही’ नामक एक पुस्तक लिखी तो सत्यनारायण सर्राफ, खूबराम सर्राफ और उनके साथियों ने ‘बीकानेर राज्य की निरंकुशता और अत्याचारों का पर्दाफाश’ शीर्षक से एक लम्बे सोदाहरण प्रभावशाली लेख द्वारा दिल्ली के ‘प्रिंसली इंडिया’ और ‘रियासती’ तथा अजमेर के ‘त्यागभूमि’ नामक समाचार पत्र में बीकानेर राज्य में गंगा सिंह जी की की निरंकुशता और अत्याचारों के समाचार प्रकाशित करवाए! इन खबरों के प्रकाशन से बीकानेर सरकार बौखला उठी !

बीकानेर राज्य के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने ‘बीकानेर : एक दिग्दर्शन’ नामक विरोध-ज्ञापन तैयार करके गोलमेज़ सम्मेलन के सदस्यों में बांटा | इस पेंपलेट में बीकानेर की वास्तविकता और महाराजा की दमनकारी नीतियों का खुलासा किया गया था| गोलमेज सम्मेलन के अध्यक्ष लार्ड सेंकी ने उस ज्ञापन को महाराजा गंगा सिंह के सामने ठीक उस समय रख दिया जब वे बड़े जोश के साथ बीकानेर में प्रशासनिक- सुधार संबंधी अपने विचार व्यक्त कर रहे थे ! लार्ड सेंकी ने ज्ञापन पर यह भी लिख दिया था कि “”बीकानेर महाराजा को इस ज्ञापन का भी समुचित उत्तर देना चाहिए" ज्ञापन को देख कर महाराज अत्यधिक खिन्न हुए और गोलमेज सम्मेलन के पूरा समाप्त होने से पहले ही बीमार होने का बहाना कर गुस्से में भर कर भारत लौट आए | [२३] गोलमेज सम्मेलन से लौटने के तुरंत बाद महाराजा ने अपने राज्य में सार्वजनिक सुरक्षा कानून लागू किया और स्वामी गोपाल दास, चंदनमल बहड, सत्यनारायण सर्राफ, खूबचंद सर्राफ आदि कई देशभक्त राष्टट्रीय लोगों को 'बीकानेर षड्यंत्र' के नाम पर गिरफ्तार कर लिया गया! [२४]

बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना

4 अक्टूबर 1936 को बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना के बाद किसानो पर होने वाले अत्याचार, लाग-बाग, हरिजन समस्याएं और पुलिस द्वारा जनता पर किए जाने वाले अत्याचार के विरुद्ध अनेक कार्यक्रम चलाए गए| इस समय बीकानेर में महाराजा गंगा सिंह का शासन था| मार्च 1937 में महाराज सरकार ने प्रजामंडल के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया| कुछ समय बाद रिहा करके तत्काल बाद 6 वर्ष के लिए राज्य से निर्वासित कर दिया गया | राज्य से निर्वासित किये गये नेताओं में वकील मुक्ता प्रसाद, मघाराम वैद, लक्ष्मी दास आदि शामिल थे| प्रजामंडल के नेताओं को बीकानेर से बाहर निकाल कर प्रजामंडल को निष्क्रिय बना दिया गया | बीकानेर महाराज गंगासिह द्वारा बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना के कुछ समय बाद ही उसे निष्क्रिय कर देने की इस घटना को बीकानेर प्रजामंडल की भ्रूण हत्या भी कहा गया | 22 मार्च 1937 को अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के तत्वाधान में दिल्ली स्थित मारवाड़ी लाइब्रेरी में एक सभा का आयोजन किया गया, इस सभा में प्रमुख रूप से बीकानेर राज्य में गंगा सिंह जी की इस मनमानी की निंदा की गई | बीकानेर से निष्कासित लोगों में से एक मघाराम ने कलकत्ता में निवास कर रहे प्रवासी राजस्थानियों के सहयोग से कलकत्ता में बीकानेर राज्य प्रजा मंडल की स्थापना की और बीकानेर की थोथी-पोथी नाम की पुस्तिका भी प्रकाशित करवाई गई | इस प्रकार बीकानेर राज्य प्रजामंडल की स्थापना राजस्थान से बाहर ही हो पायी ! महाराजा गंगा सिंह के दमन का एक और उदाहरण पुस्तक 'स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान' : लेखक : ओम प्रकाश सारस्वत में इस प्रकार आया है [२५] "बीकानेर में सरकार द्वारा किये जा रहे दमन व अत्याचार पर टिप्पणी करते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरु ने कहा था : "जहाँ बीकानेर राज्य में विवाह-शादी की कुमकुम पत्रिका तक सरकार द्वारा सेंसर की जाती हो , परदे की ओट से जनता पर भीषण अत्याचार किये जाते हों, तथा अपने बचाव में अनगिनत दलीलें दी जातीं हों, उस राज्य के शासक इंसान नहीं हैवान हैं!"

महाराजा गंगा सिंह के व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी कुछ लोमहर्षक कहानियां (जैसे विजय सिंह द्वारा एक गैर-राजपूत युवती से प्रेम में की गयी आत्महत्या / हत्या आदि ) मौखिक इतिहास के तौर पर आज भी बीकानेर के पुराने लोगों को याद हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी से अपनी पुस्तक 'कहानी-दर्शन' के लिए पुरस्कृत प्रसिद्ध विधि-लेखक और साहित्यकार आचार्य भालचन्द्र गोस्वामी 'प्रखर' ने सन चालीस के दशक में इनके पुत्र विजय सिंह द्वारा की गयी आत्महत्या के लिए महाराजा को उत्तरदायी सिद्ध करते एक प्रसिद्ध कविता भी लिखी थी- "बिजय-भवन' जैसा प्रकाश परिमल ने उल्लेख किया है - कोटर में एक भवन मृत्यु की थपकियों से उन्मन सोया है कर तंद्रालोचन, जो जाग पड़ा था चरण-चाप, यह विजय भवन, यह विजय-भवन !" [२६]

पर इस सब से ये बात तो निर्विवाद ही है कि उन जैसा विवादास्पद राजा बीकानेर राज्य में कभी नहीं हुआ था और महाराजा गंगा सिंह अपने व्यक्तित्व के विरोधाभासी पहलुओं के लिए राजस्थान के इतिहास में से तो कभी भी आसानी से तो भुलाए नहीं जा सकेंगे ।

निधन

२ फरवरी १९४३ को बंबई में ६२ साल की उम्र में आधुनिक बीकानेर के निर्माता जनरल गंगासिंह का केंसर से निधन हुआ।[२७]

सन्दर्भ

  1. https://www.bhaskar.com/RAJ-BIK-MAT-latest-bikaner-news-034004-2013298-NOR.html/
  2. https://en.wikipedia.org/wiki/Ganga_Singh
  3. https://en.wikipedia.org/wiki/Ganga_Singh
  4. स्क्रिप्ट त्रुटि: "citation/CS1" ऐसा कोई मॉड्यूल नहीं है।
  5. https://en.wikipedia.org/wiki/Ganga_Singh
  6. https://en.wikipedia.org/wiki/Ganga_Singh
  7. https://en.wikipedia.org/wiki/Ganga_Singh
  8. https://books.google.co.in/books?id=KcAjDwAAQBAJ&pg=PA130&dq=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE+%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9&hl=en&newbks=1&newbks_redir=1&sa=X&ved=2ahUKEwjgpsmfmp_2AhVZTmwGHY3JCS84ChDoAXoECAcQAg
  9. https://en.wikipedia.org/wiki/Ganga_Singh
  10. https://en.wikipedia.org/wiki/Ganga_Singh
  11. द टाइम्स (लंदन). 3 July 1902. संस्करण 36810,
  12. https://www.abebooks.com/Regal-Patriot-Maharaja-Ganga-Singh-Bikaner/982377351/bd
  13. https://www.google.com/search?source=univ&tbm=isch&q=bikaner+silver+jubilee+books&fir=vDkhpP1fd2AWoM%252C-ELnax0yYTJiKM%252C_%253BXhvABYJiUZdM6M%252C-ELnax0yYTJiKM%252C_%253BZ1COFrN0rmv1WM%252CxZsyzaqK7T-x4M%252C_%253B7CSfIr4rCn3GUM%252CDqKfyY7axYLbMM%252C_%253B2VNuAELIEWLl-M%252C-_6r23-IYhtMtM%252C_%253BhvfEyLxtCL_37M%252CuFKmBXa09IidaM%252C_%253BSfhFymq3V8kwTM%252CCjk2eVtFVi4wKM%252C_%253B-YMNMfSL5wbmPM%252CJywSkIFz4NxVEM%252C_%253Bj20lOEIiQmqrHM%252COCsoiTWLN-ETyM%252C_%253BbbhznNjQie5OGM%252C-ELnax0yYTJiKM%252C_&usg=AI4_-kRvGziTgESquqlCzNFjsyem1o8BtA&sa=X&ved=2ahUKEwiLrZTuo672AhXDxzgGHWy8BLMQjJkEegQIAhAC
  14. https://books.google.com/books/about/His_Highness_the_Maharaja_of_Bikaner.html?id=BtIBAAAAMAAJ
  15. 'तैलंग कुलम' पत्रिका में भानु भारवि का लेख
  16. 'स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान' १८५७-१९५६  : लेखक : ओमप्रकाश सारस्वत : अध्याय ७
  17. राजस्थान सरकार द्वारा संस्थापित 'राजस्थान स्वर्ण जयन्ती समारोह समिति' के अनेक प्रकाशनों में से एक (सदस्य-सचिव : हेमन्त शेष :)
  18. https://www.indiaolddays.com/%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%86%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%A8/
  19. https://books.google.co.in/books?id=dcVhDwAAQBAJ&pg=RA2-PT86&lpg=RA2-PT86&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE+%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%AE+%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B0+%E0%A5%A7%E0%A5%AF%E0%A5%A9%E0%A5%A8&source=bl&ots=ASZwWcdUKe&sig=ACfU3U2CJF3Q7Fg6MrIN9UBna0ogNfuEjQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwj94Mes26H2AhXJzjgGHTs1Cdk4ChDoAXoECAoQAw
  20. https://www.bhaskar.com/news/latest-bikaner-news-022502-1698671.html
  21. https://www.etvbharat.com/hindi/rajasthan/state/churu/in-churu-tricolor-hoisted-at-dharma-stupa-17-years-before-the-independence-of-the-country/rj20200126081450345
  22. https://www.bhaskar.com/news/RAJ-OTH-MAT-latest-churu-news-050530-2453822-NOR.html
  23. 'स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान' १८५७-१९५६  : लेखक : ओमप्रकाश सारस्वत : अध्याय ७ :
  24. 'स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान' १८५७-१९५६  : लेखक : ओमप्रकाश सारस्वत : अध्याय ७ : राजस्थान स्वर्ण जयंती प्रकाशन
  25. 'स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान' १८५७-१९५६  : लेखक : ओमप्रकाश सारस्वत : अध्याय ७ : पृष्ठ ७७-७८ 'राजस्थान में जन आन्दोलन' : प्रकाशक : 'राजस्थान स्वतंत्रता संग्राम स्वर्ण जयंती समिति' (सदस्य-सचिव : हेमंत शेष)
  26. https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%B2
  27. https://en.wikipedia.org/wiki/Ganga_Singh

[[श्रेणी:]]