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	<title>ताराबाई - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>2401:4900:1B81:9A67:1:1:DD87:DB41 २३ फ़रवरी २०२२ को ०९:५५ बजे</title>
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&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{स्रोतहीन|date=अप्रैल 2020}}'''महारानी ताराबाई''' (१६७५-१७६१) [[राजाराम प्रथम|राजाराम महाराज]] की पहली पत्नी तथा [[शिवाजी|छत्रपति शिवाजी]] महाराज के [[सेनापति|सरसेनापति]] ''हंबीरराव मोहिते'' की कन्या थीं। इनका जन्म 1675 में हुआ और इनकी मृत्यु 9 दिसंबर 1761 ई० को हुयी। ताराबाई का पूरा नाम ताराबाई भोंसले था। राजाराम की मृत्यु के बाद इन्होंने अपने 4 वर्षीय पुत्र [[शिवाजी द्वितीय|शिवाजी दित्तीय]]  का राज्याभिषेक करवाया और मराठा साम्राज्य की संरक्षिका बन गयीं।ताराबाई का विवाह छत्रपति शिवाजी महाराज के छोटे पुत्र राजाराम प्रथम के साथ हुआ राजाराम 1689 से लेकर 1700 में उनकी मृत्यु हो जाने के पश्चात ताराबाई [[मराठा साम्राज्य]] कि संरक्षिका बनी। और उन्होंने शिवाजी दित्तीय को मराठा साम्राज्य का [[छत्रपति]] घोषित किया और एक संरक्षिका के रूप में मराठा साम्राज्य को चलाने लगी उस वक्त शिवाजी द्वितीय मात्र 4 वर्ष के थे 1700 से लेकर 1707 ईसवी तक मराठा साम्राज्य की संरक्षिका उन्होंने [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] को बराबर की टक्कर दी और उन्होंने 7 सालों तक अकेले दम पर [[मुग़ल साम्राज्य|मुगलों]] से टक्कर ली और कई [[सरदार|सरदारों]] को एक करके वापस मराठा साम्राज्य को बनाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ताराबाई अपने पुत्र को गद्दी पर देखना चाहती थी। परंतु ऐसा हो ना सका [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] की मृत्यु के बाद [[बहादुर शाह प्रथम]] ने छत्रपति [[शाहु|शाहू]] जो कि उसकी कैद में थे उनको दिल्ली से छोड़ दिया और जिसके करण साहू ने यहां पर आकर गद्दी के लिए संघर्ष शुरु हो गया और महाराष्ट्र में गृह युद्ध छिड़ गया अंततः शाहू ने युद्ध में ताराबाई की सेना को पराजित कर उन्हें पूरी तरीके से खत्म कर दिया। और उनको [[कोल्हापुर]] राज्य दे दिया और वहीं पर उनका राज्य स्थापित कर दिया और खुद मराठा समाज शाहु के काल में ही मराठा साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। और छत्रपति शाहू छत्रपति हालात में मौत होने वाले  1740 के दशक में ताराबाई अपनी पोते रामराज को शाहू के पास लेकर गई क्योंकि शाहू का कोई पुत्र नहीं था रामराज शाहु के पास और कोई पुत्र नहीं था इसीलिए [[शिवाजी]] के वंशज होने के नाते रामराज छत्रपति शाहू जी को अपना पुत्र घोषित कर दिया। और रामराज 1749 [[सातारा|सतारा]] की गद्दी पर बैठ गए। उसके गददी पर बैठते ही पेशवा [[बालाजी बाजी राव|बालाजी बाजीराव]] को हटाने के लिए ताराबाई ने [[रामराज]] से कहा पर रामराज ने मना कर दिया। जिससे ताराबाई ने रामराज को सतारा के किले में कैद कर लिया। जब [[बालाजी बाजी राव|बालाजी बाजीराव]] को यह खबर पहुंची तो वे छत्रपति को रिहा करने के लिए सतारा की ओर चल दिए 1752 मई को यह खबर लगते ही उन्होंने दामाजी राव गायकवाड की 15000 सेना के साथ दाभाडे परिवार को एक करके जो कि पूरा परिवार [[पेशवा]] का पुराना दुश्मन था बालाजी बाजीराव के खिलाफ साजिश रची बालाजी बाजीराव नंवंबर 1752 में पूर्ण रूपेण परास्त किया और ताराबाई से संधि कर ली जिसके तहत ताराबाई ने रामराज को अपना पोता ना होना घोषित कर दिया और अब मराठा साम्राज्य की सारी शक्ति पेशवाओं के हाथ में चली गई। 14 जनवरी 1761 में [[पानीपत का तृतीय युद्ध|पानीपत के तृतीय युद्ध]] में मराठों की हार होने के बाद [[जून]] 1761 में बालाजी बाजीराव की मृत्यु हो गई और उसके बाद ही दिसंबर 1761 में ताराबाई का भी निधन हो गया। ताराबाई मराठा साम्राज्य की सबसे ताकतवर महिलाओं में से निकली और जिस तरह से उन्होंने 7 वर्षों तक [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] से लड़ाई लड़ी हो उनकी महानता को दर्शाता है और उनकी दूरदर्शिता को भी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{मराठा साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:मराठा साम्राज्य]]&lt;/div&gt;</summary>
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