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	<title>जेजाकभुक्ति - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;अनुनाद सिंह १५ अप्रैल २०२२ को १४:५५ बजे</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:A Bundelkhand Raja standing on his terrace (6125060272).jpg|thumb|right|200px|जेजाकभुक्ति के राजा। ]]&lt;br /&gt;
'''जेजाकभुक्ति''' या '''जिझौती''' [[गुप्त राजवंश|गुप्तकाल]] का एक प्रसिद्ध राज्य था जो [[यमुना]] और [[नर्मदा]] नदियों के बीच में स्थित है।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/12475/5/05_chapter1.pdf बुन्देलखण्ड का संक्षिप्त परिचय, सीमांकन एवं ...] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170304193213/http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/12475/5/05_chapter1.pdf |date=4 मार्च 2017 }}।पीडीएफ़&amp;lt;/ref&amp;gt; इस पर [[चन्देल|चन्देल राजाओं]] का शासन था। इसे अब [[बुन्देलखण्ड|बुंदेलखंड]] कहते हैं। यह अब आंशिक रूप से [[उत्तर प्रदेश]] में तथा आंशिक रूप से [[मध्य प्रदेश|मध्यप्रदेश]] में पड़ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिझौती वीर-प्रसविनी भूमि रही है। इसने चंदेलों और बनाफर सरदार [[आल्हा]] [[ऊदल]] को ही नहीं, स्वातंत्रय-प्रेमी [[महाराजा छत्रसाल|छत्रसाल]] आदि को भी जन्म देकर भारत का मस्तक उन्नत किया है। [[खजुराहो]] की अनुपम ललितकला और [[वास्तुकला|स्थापत्य]] भी इसी की उपज हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
कहा जाता है कि [[चन्देल|चंदेल]] राजा जयशक्ति जेजाक के नाम से ही बुंदेलखंड का नाम '''जेजाभुक्ति''' पड़ा है। चंदेल आरंभ में [[प्रतिहारों]] के सामंत रहे होंगे। हर्ष चंदेल के समय में, जो इस वंश का पहला प्रतापी राजा था, चंदेलों ने क्षितिपाल को अपने राजसिंहासन पर पुन: प्रतिष्ठित किया। क्षितिपाल कन्नौज के राजा महीपाल का दूसरा नाम हो सकता है। हर्ष के पुत्र यशोवर्मा ने चेदियों और प्रतिहारों को हराया और कालिंजर पर अधिकार कर लिया। उसका पुत्र धंग और भी प्रतापी और चिरजीवी सिद्ध हुआ। राज्य के आरंभकाल में भिलसा, ग्वालियर और कालिंजर के दुर्ग उसके अधिकार में थे और पड़ोसी राज्य उससे भयभीत थे। इसके बाद राज्य की सीमाएँ और भी बढ़ी होंगी। धंग के पुत्र गंड ने संभवत: आनंदपाल शाही को महमूद गजनवी के विरुद्ध सहायता दी। सन्‌ 1018 में जब महमूद ने कन्नौज के राजा राज्यपाल प्रतिहार को अपनी अधीनता मानने के लिये विवश किया तो विद्याधर चंदेल ने राज्यपाल को साम्राज्य के लिये अयोग्य समझ कर युद्ध में परास्त किया और उसके पुत्र त्रिलोचनपाल को कन्नौज की गद्दी पर बिठाया। सन्‌ 1020 के लगभग महमूद और विद्याधर में मुठभेड़ हुई। महामूद को कालिंजर के घेरे में विफलता हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्याधर की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिये जिझौती राज्य की शक्ति क्षीण हुई। किंतु कीर्तिवर्मा ने चेदियों को हराकर फिर इसे समुन्नत किया। इसी के समय कृष्ण मिश्र ने प्रबोधचंद्रोदय नाटक की रचना की। कीतिवर्मा के पौत्र मदनवर्मा ने भी अच्छी ख्याति प्राप्त की। मदनवर्मा का पौत्र सुप्रसिद्ध परमर्दी या परमाल था। सन्‌ 1182 में पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने इसके राज्य के कुछ भाग को लूटा तथा अपने सेनापति खेतसिंह खंगार को यहां का शासक बनाया । कालिंजर परमर्दिदेव के पास ही रहा । सन्‌ 1202 में कुतबुद्दीन ऐबक ने कालिंजर पर अधिकार कर लिया किंतु इससे जिझौती के चंदेल राज्य की समाप्ति न हुई। परमर्दी के पुत्र त्रैलोक्य वर्मा ने कालिंजर वापस ले लिया और 16वीं शताब्दी तक वह चंदेलों के हाथ में रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
* [[चन्देल]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:बुंदेलखंड]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;अनुनाद सिंह</name></author>
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