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	<title>hiwiki - सदस्य योगदान [hi]</title>
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		<title>नरसिंह</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;2409:4051:11C:6A79:E4FC:1D62:9E3C:ED2B: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{redirect|नरसिम्हा|फ़िल्म|नरसिम्हा (फ़िल्म)}}{{infobox deity |name = नरसिंह|deity_of=सुरक्षा के देवता और भक्तों की देखभाल करने वाले|image=Munneswaram Narasimha.jpg|consort=[[नरसिम्ही]]|weapon=तेज नाखून, चक्र, गदा और शंख|battles=हिरणकशिपु वध|other_names=नरहरि , उग्रविर  महाविष्णु , हिरण्यकशिपु अरी , नरसिम्हा आदि|texts=विष्णु पुराण , भागवत पुराण आदि|caption=नृसिंह रूपी [[विष्णु]][[हिरण्यकशिपु]] का वध करते हुए}}'''नरसिंह''' नर + सिंह (&amp;quot;मानव-सिंह&amp;quot;) को [[पुराण|पुराणों]] में भगवान [[विष्णु]] का [[अवतार]] माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://srimadbhagavatam.com/1/3/18/en1 Bhag-P 1.3.18] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20070926234746/http://srimadbhagavatam.com/1/3/18/en1 |date=26 सितंबर 2007 }} &amp;quot;चौदहवें अवतार के रूप में भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप का अवतार लेकर [[नास्तिक]] हिरण्यकश्यपु के शरीर को अपने नख से दो टुकड़ों में विभक्त कर दिया जैसे [[बढई]] किसी लकडी के दो टुकडों को चीरता है&amp;quot;&amp;lt;/ref&amp;gt; जो आधे मानव एवं आधे [[सिंह]] के रूप में प्रकट होते हैं, जिनका सिर एवं धड तो मानव का था लेकिन चेहरा एवं पंजे सिंह की तरह थे&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://srimadbhagavatam.com/7/8/19-22/en1 |title=Bhag-P 7.8.19-22 |access-date=7 अप्रैल 2008 |archive-date=29 दिसंबर 2008 |archive-url=https://web.archive.org/web/20081229123510/http://srimadbhagavatam.com/7/8/19-22/en1 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt; वे [[भारत]] में, खासकर दक्षिण भारत में [[वैष्णव]] संप्रदाय के लोगों द्वारा एक देवता के रूप में पूजे जाते हैं जो विपत्ति के समय अपने [[भक्त|भक्तों]] की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;स्टीवेन जे रोजेन, ''नरसिंह अवतार, द हाफ मैन/हाफ लायन इनकारनेशन'', पृ5&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पूजन विधि ==&lt;br /&gt;
=== प्रार्थना ===&lt;br /&gt;
नरसिंहदेव, के बारे में कई तरह की प्रार्थनाएँ की जाती हैं जिनमे कुछ प्रमुख ये हैं:&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
नरसिंह [[मंत्र]]&lt;br /&gt;
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।&lt;br /&gt;
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्षा आत्मसमर्पण करता हूँ।)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== श्री नृसिंह स्तवः ===&lt;br /&gt;
[[गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रहलाद हृदयाहलादं भक्ता विधाविदारण।&lt;br /&gt;
शरदिन्दु रुचि बन्दे पारिन्द् बदनं हरि ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नमस्ते नृसिंहाय प्रहलादाहलाद-दायिने।&lt;br /&gt;
हिरन्यकशिपोर्ब‍क्षः शिलाटंक नखालये ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतो नृसिंहो परतोनृसिंहो, यतो-यतो यामिततो नृसिंह।&lt;br /&gt;
बर्हिनृसिंहो ह्र्दये नृसिंहो, नृसिंह मादि शरणं प्रपधे ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तव करकमलवरे नखम् अद् भुत श्रृग्ङं।&lt;br /&gt;
दलित हिरण्यकशिपुतनुभृग्ङंम्।&lt;br /&gt;
केशव धृत नरहरिरुप, जय जगदीश हरे ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वागीशायस्य बदने लर्क्ष्मीयस्य च बक्षसि।&lt;br /&gt;
यस्यास्ते ह्र्देय संविततं नृसिंहमहं भजे ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री नृसिंह जय नृसिंह जय जय नृसिंह।&lt;br /&gt;
प्रहलादेश जय पदमामुख पदम भृग्ह्र्म ॥६॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== नरसिंह देव के नाम ==&lt;br /&gt;
# नरसिंह&lt;br /&gt;
# नरहरि&lt;br /&gt;
# उग्र विर माहा विष्णु&lt;br /&gt;
# हिरण्यकशिपु   अरी &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== तीर्थस्थल ==&lt;br /&gt;
निरा नरसिंहपूर जिल्हा-पुणे राज्य-महाराष्ट्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== नरसिंह विग्रह के दस (१०) प्रकार ==&lt;br /&gt;
# उग्र नरसिंह&lt;br /&gt;
# क्रोध नरसिंह&lt;br /&gt;
# मलोल नरसिंह&lt;br /&gt;
# ज्वल नरसिंह&lt;br /&gt;
# वराह नरसिंह&lt;br /&gt;
# भार्गव नरसिंह&lt;br /&gt;
# करन्ज नरसिंह&lt;br /&gt;
# योग नरसिंह&lt;br /&gt;
# लक्ष्मी नरसिंह&lt;br /&gt;
# छत्रावतार नरसिंह/पावन नरसिंह/पमुलेत्रि नरसिंह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== नरसिंह देव मन्दिर ==&lt;br /&gt;
खरकड़ा, खेतड़ी, राजस्थान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह मंदिर सतयुग कालीन है। कहते है कि यहाँ पर भृगु ऋषि ने तपस्या की थी जब विष्णु जी ने नर्सिंग जी का अवतार ले कर हिरण्यकश्यप का वध किया तब भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को याद किया और तब भगवान नर्सिंग जी ने उन्हें दर्शन दिए और यहाँ पर अपने नाखूनों से एक कुंड का बनाया और अपने शरीर को साफ किया और यही पर अंतर्ध्यान हुए।यहाँ पर नर्सिंग चौदश को भगतों का तांता लगा रहता है।इस मंदिर को औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था बाद में इसका फिर से जीर्णोद्धार हुआ है।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदामाण्डी,झुंझुनूं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह मंदिर 1331 में बनवाया गया था बहुत ही विशाल और भव्य मंदिर है इसका वीडियो आप youtube पर Rj Moto Blog चैनल पर देख सकते है।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मथुरा  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अति प्राचीन मथुरा पुरी मै भगवान नरसिंह का   मंदिर  मानिक चौक  मै इस्थित  है यहाँ  भगवान  नरसिंह और वाराह  की घाटी  है   यहाँ  नरसिंह चौदस  को  भगवान  नरसिंह का  उत्सव  मनाया  जाता है तथा लीला  भी  की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== मायापुर ===&lt;br /&gt;
[[मायापुर]] [[इस्कॉन]] में नरसिंह देव का मन्दिर हे।&lt;br /&gt;
यह मन्दिर नदिया जिला, पश्चिम बंगाल में स्थित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== बीकानेर ===&lt;br /&gt;
बीकानेर लखोि‍टयों के चौक में वर्षो्ं पुराना नर ि‍संह समेत पूरे शहर में कुल चार नर ि‍संह मंि‍दर हैा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्राम असवाल कोटुली, जिला अल्मोड़ा, तहसील- भिक्यासैन में भी एक नृसिंह का प्राचीन मंदिर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===हाटपिप्लिया=== &lt;br /&gt;
नृसिंह मंदिर हाटपिप्लिया में भगवान नरसिंह कि ७.५ कि लो वजनी पाषाण प्रतिमा है जो कि हर वर्ष डोल ग्यारस पर्व पर भमोरी नदी पर 3 बार तेराई जाती है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''&amp;lt;big&amp;gt;बनमनखी बिहार&amp;lt;/big&amp;gt;'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिहार राज्य के पूर्णिया जिला के बनमनखी में सिकलीगढ़ धरहरा गांव हैं। बताया जाता है कि इसी गांव में '''भगवान नरसिंह''' अवतरित हुए थे और यही वो गांव है जहां भक्त प्रह्लाद की बुआ होलिका अपने भतीजे को गोद में लेकर आग में बैठी थी। मान्यता के मुताबिक यहीं से होलिकादहन की परंपरा की शुरुआत हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसी मान्यता है कि प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप का किला सिकलीगढ़ में था। गांव के बड़े बुजुर्गों की माने तो अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए खंभे से भगवान नरसिंह ने अवतार लिया था। मान्यता है कि उस खंभे का एक हिस्सा जिसे '''माणिक्य स्तंभ''' के नाम से जाना जाता है वो आज भी मौजूद है। इसी स्थान पर प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप का वध हुआ था। खास बात ये है कि माणिक्य स्तंभ 12 फीट मोटा है और करीब 65 डिग्री पर झुका हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गीता प्रेस, गोरखपुर के कल्याण के 31 वें साल के तीर्थांक विशेषांक में भी सिकलीगढ धरहरा का जिक्र किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[प्रहलाद]]&lt;br /&gt;
* [[हिरण्यकश्यप]]&lt;br /&gt;
* [[होलिका]]&lt;br /&gt;
* [[नरसिंह शतकम]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== टिप्पणियां ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [http://srimadbhagavatam.com/7/7/en1 भागवत पुराण - प्रहलाद की गर्भ शिक्षा] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090204213943/http://srimadbhagavatam.com/7/7/en1 |date=4 फ़रवरी 2009 }}&lt;br /&gt;
* [http://srimadbhagavatam.com/7/8/en1 भागवत पुराण - हिरण्यकश्यप वध] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20130922222536/http://srimadbhagavatam.com/7/8/en1 |date=22 सितंबर 2013 }}&lt;br /&gt;
* [http://www.stephen-knapp.com/prayers_to_lord_narasimhadeva.htm नरसिंह देव की प्रार्थनाएँ]&lt;br /&gt;
* भगवान नरसिंह की कहानी [https://vedickahaniya.blogspot.com/2020/09/narsingh-or-prahlad-ki-kahani.html?m=1 &amp;quot;https://vedickahaniya.blogspot.com/2020/09/narsingh-or-prahlad-ki-kahani.html&amp;quot;]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:नरसिंह‎|*]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>पार्वती</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{redirect|गौरी | अन्य | गौरी (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
{{Hdeity infobox| &amp;lt;!--Wikipedia:WikiProject Hindu mythology--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 image          = BG Block Saltlake Durgapujo 2020.jpg&lt;br /&gt;
| type           = hindu&lt;br /&gt;
| name           = माता [[पार्वती]]([[सती]]/[[गौरी]])&lt;br /&gt;
| caption         = देवी पार्वती का [[दुर्गा]] रूप &lt;br /&gt;
| devanagari        = पार्वती&lt;br /&gt;
| sanskrit_transliteration = Pārvatī&lt;br /&gt;
| affiliation       = [[देवी]], [[शक्ति]], [[आदि शक्ति]],आदि पराशक्ति&lt;br /&gt;
| god_of          = शक्ति, सुंदरता, सद्भाव, उर्वरता, प्रेम , विवाह, संतति की देवी एवम साक्षात् प्रकृति स्वरूपा,शिवानी (शिव की पटरानी)&lt;br /&gt;
| abode          = [[कैलास पर्वत|कैलाश]] (ससुराल)&lt;br /&gt;
हिमालय (पैतृक घर), [[मनिद्विप ]]&lt;br /&gt;
| mantra          = ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चै॥ ॥ ॐ उमामहेश्वराभ्याम नमः॥&lt;br /&gt;
॥ ॐ महामये विद्माहे शिवप्रियाय धीमहि तन्नो उमा &lt;br /&gt;
प्रचोद्यात ॥&lt;br /&gt;
॥ ॐ सर्वसमोहन्ये विद्महे विश्वजनन्ये धीमहि तन्नो शक्ति प्रचोद्यात॥&lt;br /&gt;
॥ ॐ नमो देव्ये महादेव्ये शिवाये सततम नमः॥&lt;br /&gt;
॥ ॐ नमः प्रकृत्यः भद्राया नियतः प्रणतास्मितः॥&lt;br /&gt;
|| त्वंग माया प्राकृति साक्षात परम ब्रह्म महात्मने लंबे जगन जगत सर्वे टॉम जगत जननी शिबे ||&lt;br /&gt;
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| mount          = शेर , सिंह &lt;br /&gt;
| children      = [[कार्तिकेय]], [[अशोकसुन्दरी]] , [[ज्योति]] , [[मनसा देवी |मनसा ]] और [[गणेश]]                 |battles=महिषासुर एवं देवी के महिषासुरमर्दिनी रूप का युद्ध&lt;br /&gt;
चंड मुंड एवं देवी के काली रूप का युद्ध&lt;br /&gt;
धूम्रलोचन एवं देवी के चंडी रूप का युद्ध&lt;br /&gt;
दुर्गामासुर एवं देवी के दुर्गा रूप का युद्ध&lt;br /&gt;
शुंभ निशुंभ एवं देवी के कौशीकी रूप का युद्ध|day=[[सोमवार]] और [[शुक्रवार]]|mother=मैनावती|father=हिमावन|texts=[[वेद]], श्री देवी भागवत पुराण, [[काली पुराण]], तंत्र चुरामणि, देवी महातम्यम, [[रामायण]], श्री दुर्गा सप्तशती, श्री चंडी पाठ, [[शिव महापुराण]], [[विष्णु पुराण]], [[गणेश पुराण]], स्कंद पुराण, उपनिषद, श्री पार्वती महात्मय , श्री माता पार्वती चालीसा, श्री 52 शक्ति पीठ महात्म्य एवं अन्य कई धार्मिक ग्रंथ और किंवदंतियां|festivals=गंगौर, [[महाशिवरात्रि]], दुर्गाष्टमी, [[नवरात्रि]], दुर्गा पूजा, हरितालिका तीज, श्रावण, गौरी पूजन, तीज, काली पूजा, गौरी तृतीय, शीतलाष्टमी,|deity_of=शक्ति, सुंदरता, देवत्व, दिव्य शक्ति, ऊर्जा, सुहाग, सद्भाव, प्रजनन क्षमता, प्रेम , विवाह, संतति की देवी एवम साक्षात् प्रकृति स्वरूपा,शिवानी (शिव की पटरानी), जगजन्नी, जगतमाता, महादेवी|siblings=[[विष्णु]] बड़े भाई  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता [[गंगा देवी|गंगा]] बड़ी बहन  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अदिति]] पूर्व जन्म में माता [[सती]] की बड़ी बहन  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिति पूर्व जन्म में माता [[सती ]] की बड़ी बहन   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कद्रु पूर्व जन्म में माता [[सती ]]की बड़ी बहन&lt;br /&gt;
विनीता पूर्व जन्म में माता [[ सती ]] की बड़ी बहन}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पार्वती''', उमा या गौरी मातृत्व, शक्ति, प्रेम, सौंदर्य, सद्भाव, विवाह, संतान की देवी हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;H.V. Dehejia, Parvati: Goddess of Love, Mapin, {{ISBN|978-8185822594}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;James Hendershot, Penance, Trafford, {{ISBN|978-1490716749}}, pp 78&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name=suchan&amp;gt;Suresh Chandra (1998), Encyclopedia of Hindu Gods and Goddesses, {{ISBN|978-8176250399}}, pp 245–246&amp;lt;/ref&amp;gt;देवी पार्वती कई अन्य नामों से जानी जाती है, वह सर्वोच्च हिंदू देवी परमेश्वरी [[आदिशक्ति|आदि पराशक्ति]] (शिवशक्ति) की साकार रूप है और [[शाक्त सम्प्रदाय]] या हिन्दू धर्म मे एक उच्चकोटि या प्रमुख देवी है और उनके कई गुण,रूप और पहलू हैं। उनके प्रत्येक पहलुओं को एक अलग नाम के साथ व्यक्त किया जाता है, जिससे उनके भारत की क्षेत्रीय हिंदू कहानियों में 10000 से अधिक नाम मिलते हैं। लक्ष्मी और सरस्वती के साथ, वह हिंदू देवी-देवताओं (त्रिदेवी) की त्रिमूर्ति का निर्माण करती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;Frithjof Schuon (2003), Roots of the Human Condition, {{ISBN|978-0941532372}}, pp 32&amp;lt;/ref&amp;gt; माता पार्वती हिंदू भगवान शिव की पत्नी हैं । वह पर्वत राजा [[हिमांचल]] और [[रानी मैना]] की बेटी हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;H.V. Dehejia, Parvati pp 11&amp;quot;&amp;gt;H.V. Dehejia, Parvati: Goddess of Love, Mapin, {{ISBN|978-8185822594}}, pp 11&amp;lt;/ref&amp;gt;पार्वती हिंदू देवताओं गणेश, कार्तिकेय, अशोकसुंदरी‌, ज्योति और मनसा देवी की मां और अय्यप्पा की सौतेली माता  हैं। पुराणों में उन्हें श्री विष्णु की बहन कहाँ गया है। वे ही मूल प्रकृति और कारणरूपा है। &amp;lt;ref&amp;gt;Edward Washburn Hopkins, {{Google books|-H0eiuvcG5IC|Epic Mythology|page=224}}, pp. 224–226&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name=wjw295&amp;gt;William J. Wilkins, [https://archive.org/stream/hindumythologyve00inwilk#page/294/mode/2up Uma – Parvati] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160410221315/https://archive.org/stream/hindumythologyve00inwilk#page/294/mode/2up |date=10 अप्रैल 2016 }}, Hindu Mythology – Vedic and Puranic, Thacker Spink London, pp 295&amp;lt;/ref&amp;gt;शिव विश्व के चेतना है तो पार्वती विश्व की ऊर्जा हैं। पार्वती माता जगतजननी अथवा परब्रह्मस्वरूपिणी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नामवाली==&lt;br /&gt;
[[File:Another view of the ascetic Shiva and the well-dressed Parvati (bazaar art, c.1950's).jpg|thumb|शिव-पार्वती]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ललिता सहस्रनाम में पार्वती (ललिता के रूप में) के 1,000 नामों की सूची है। &amp;lt;ref&amp;gt;name=Keller and Ruether (2006), Encyclopedia of Women and Religion in North America, Indiana University Press, {{ISBN|978-0253346858}}, pp 663&amp;lt;/ref&amp;gt; पार्वती के सबसे प्रसिद्ध दो में से एक उमा और अपर्णा हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India through the ages|url=https://archive.org/details/indiathroughages00mada|last=Gopal|first=Madan|year= 1990| page= [https://archive.org/details/indiathroughages00mada/page/68 68]|editor=K.S. Gautam|publisher=Publication Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India}}&amp;lt;/ref&amp;gt; स्कन्द पुराण के अनुसार,देवी पार्वती के द्वारा दुर्गमसुर को मारने के बाद देवी पार्वती का नाम दुर्गा पड़ा। उमा नाम का उपयोग सती (शिव की पहली पत्नी, जो पार्वती के रूप में पुनर्जन्म हुआ है) के लिए किया जाता है, रामायण में देवी पार्वती को उमा नाम से भी संबोधित किया गया है,देवी पार्वती को अपर्णा के रूप में संदर्भित किया जाता है ('जो सबका भरण पोषण करती है')। देवी पार्वती अंबिका ('प्रिय मां'), शक्ति ('शक्ति'), माताजी ('पूज्य माता'), माहेश्वरी ('महान देवी'), दुर्गा (अजेय), भैरवी ('क्रूर'), भवानी ('उर्वरता') आदि नामों से जानी जाती हैं। पार्वती प्रेम और भक्ति की देवी हैं, या कामाक्षी; प्रजनन, बहुतायत और भोजन / पोषण की देवी अन्नपूर्णा कहा गया है । &amp;lt;ref&amp;gt;Kinsley pp. 142–143&amp;lt;/ref&amp;gt;देवी पार्वती एक क्रूर महाकाली भी है जो तलवार उठाती है, गंभीर सिर की माला पहनती है, और अपने भक्तों की रक्षा करती है और दुनिया और प्राणियों की दुर्दशा करने वाली सभी बुराईयों को नष्ट करती है।&lt;br /&gt;
देवी पार्वती को स्वर्ण, गौरी, काली या श्यामा के रूप में संबोधित किया जाता है, इनका एक शांत रूप गौरी है, तो दूसरा भयंकर रूप काली है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास में पार्वती==&lt;br /&gt;
[[File:Parvati Statue 3968 (36a).jpg|thumb|देवी पार्वती की इंडोनेशिया के राष्ट्रीय संग्रहालय में मूर्ति]]&lt;br /&gt;
पर्वती शब्द वैदिक साहित्य में प्रयोग नही किया जाता था। इसके बजाय, अंबिका, रुद्राणी का प्रयोग किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.36&amp;quot;&amp;gt;Kinsley p.36&amp;lt;/ref&amp;gt; उपनिषद काल (वेदांत काल) के दूसरे प्रमुख उपनिषद [[केनोपनिषद]] में देवी पार्वती का जिक्र मिलता है,वहाँ उन्हें हेमवती उमा नाम से जाना जाता है &amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.36&amp;quot;/&amp;gt;तथा वहां पर उन्हें ब्रह्मविद्या भी जानने को मिलता है और इन्हें दुनिया की माँ की तरह दिखाया गया है।&amp;lt;ref name=johnmuir&amp;gt;John Muir, {{Google books|wNPaeose9K4C|Original Sanskrit Texts on the Origin and History of the People of India|page=422}}, pp 422–436&amp;lt;/ref&amp;gt; यहां देवी पार्वती को सर्वोच्च परब्रह्म की शक्ति, या आवश्यक शक्ति के रूप में प्रकट किया गया है। उनकी प्राथमिक भूमिका एक मध्यस्थ के रूप में है, जो अग्नि, वायु और वरुण को ब्रह्म ज्ञान देती है, जो राक्षसों के एक समूह की हालिया हार के बारे में घमंड कर रहे थे।&amp;lt;ref&amp;gt;''Kena Upanisad'', III.1–-IV.3, cited in Müller and in Sarma, pp. ''xxix-xxx''.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
देवी का सती-पार्वती नाम महाकाव्य काल (400 ईसा पूर्व -400 ईस्वी) में प्रकट होता है,जहाँ वह शिव की पत्नी है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.36&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
वेबर का सुझाव है कि जैसे शिव विभिन्न वैदिक देवताओं रुद्र और अग्नि का संयोजन है, वैसे ही पुराण पाठ में पार्वती रुद्र की पत्नियों की एक संयोजन है। दूसरे शब्दों में, पार्वती की प्रतीकात्मकता और विशेषताएं समय के साथ उमा, हेमावती, अंबिका,गौरी को एक पहलू में और अधिक क्रूर, विनाशकारी काली, नीरति के रूप में विकसित हुईं।&amp;lt;ref name=johnmuir/&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Weber in Hindu Mythology, Vedic and Puranic By William J. Wilkins p.239&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Tate p.176&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शारीरिक रूप और प्रतीक==&lt;br /&gt;
देवी पार्वती को आमतौर पर निष्पक्ष, सुंदर और परोपकारी के रूप में दर्शाया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;Wilkins pp.247&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Harry Judge (1993), ''Devi'', Oxford Illustrated Encyclopedia, Oxford University Press, pp 10&amp;lt;/ref&amp;gt;वह आमतौर पर एक लाल पोशाक (अक्सर एक साड़ी) पहनती है ।और क्रोध अवस्था मे काली के रूप में भी दर्शाया गया है। जब शिव के साथ चित्रित किया जाता है, तो वह आमतौर पर दो भुजाओं के साथ दिखाई देती है, लेकिन जब वह अकेली हो तो उसे चार हाथों में चित्रित किया जा सकता है। इन हाथों में त्रिशूल, दर्पण, माला, फूल (जैसे कमल) हो सकते हैं। प्राचीन मंदिरों में, पार्वती की मूर्ति अक्सर एक बछड़े या गाय के पास चित्रित होती है - भोजन का एक स्रोत। उनकी मूर्ति के लिए कांस्य मुख्य धातु रहा है, जबकि पत्थर आम सामग्री रहा है। &amp;lt;ref name=suchan/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी पार्वती के अन्य रूप==&lt;br /&gt;
 {{multiple image&lt;br /&gt;
 | direction = horizontal&lt;br /&gt;
 | width1 = 196&lt;br /&gt;
 | width2 = 190&lt;br /&gt;
 | footer = देवी पार्वती दुर्गा के रूप में&lt;br /&gt;
 | image1 = &lt;br /&gt;
 | image2 = Durga idol 2011 Burdwan.jpg&lt;br /&gt;
 }}&lt;br /&gt;
कई हिंदू कहानियां पार्वती के वैकल्पिक पहलुओं को प्रस्तुत करती हैं, जैसे कि क्रूर, हिंसक पहलू। उनका रूप एक क्रोधित, रक्त-प्यासे, उलझे हुए बालों वाली देवी, खुले मुंह वाली और एक टेढ़ी जीभ के साथ किया गया है। इस देवी की पहचान आमतौर पर भयानक [[महाकाली]] (समय) के रूप में की जाती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.46&amp;quot; /&amp;gt; लिंग पुराण के अनुसार, पार्वती ने शिव के अनुरोध पर एक असुर (दानव) दारुक को नष्ट करने के लिए अपने नेत्र से काली को प्रकट किया। दानव को नष्ट करने के बाद भी, काली के प्रकोप को नियंत्रित नहीं किया जा सका। काली के क्रोध को कम करने के लिए, शिव उनके पैरों के नीचे जा कर सो गए,जब काली का पैर शिव के छाती पर पड़ा तो काली का जीभ शर्म से बाहर निकल आया, और काली शांत हो गई।&amp;lt;ref&amp;gt;Kennedy p.338&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्कंद पुराण में, पार्वती एक योद्धा-देवी का रूप धारण करती हैं और दुर्ग नामक एक राक्षस को हरा देती हैं जो भैंस का रूप धारण करता है। इस पहलू में, उन्हें दुर्गा के नाम से जाना जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.96&amp;quot;&amp;gt;Kinsley p.96&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
देवी भागवत पुराण के अनुसार, पार्वती अन्य सभी देवियो की वंशावली हैं। इन्हें कई रूपों और नामों के साथ पूजा जाता है। देवी पार्वती का रूप या अवतार उसके भाव पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्गा पार्वती का एक भयानक रूप है, और कुछ ग्रंथों में लिखा है कि पार्वती ने राक्षस दुर्गमासुर का वध किया था और इसी कारण वे दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हुई थीं। नवदुर्गा नामक नौ रूपों में दुर्गा की पूजा की जाती है। नौ पहलुओं में से प्रत्येक में पार्वती के जीवन के एक बिंदु को दर्शाया गया है। वह दुर्गा के रूप में भी राक्षस महिषासुर, शुंभ और निशुंभ के वध के लिए भी पूजी जाती हैं। वह बंगाली राज्यों में अष्टभुजा दुर्गा, और तेलुगु राज्यों में कनकदुर्गा के रूप में पूजी जाती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाकाली पार्वती का सबसे क्रूर रूप है,यह समय और परिवर्तन की देवी के रूप में, साहस और अंतिम सांसारिक प्रलय का प्रतिनिधित्व करती है। काली, दस महाविद्याओं में से एक देवी हैं,जो नवदुर्गा की तरह हैं जो पार्वती की अवतार हैं। काली को दक्षिण में भद्रकाली और उत्तर में दक्षिणा काली के रूप में पूजा जाता है। पूरे भारत में उन्हें महाकाली के रूप में पूजा जाता है। वह त्रिदेवियों में से एक देवी है और त्रिदेवी का स्रोत भी है। वह परब्रह्म की पूर्ण शक्ति है, क्योंकि वह सभी प्राण ऊर्जाओं की माता है। वह आदिशक्ति का सक्रिय रूप है। वह तामस गुण का प्रतिनिधित्व करती है, और वह तीनो गुणों से परे है, महाकाली शून्य अंधकार का भौतिक रूप है जिसमें ब्रह्मांड मौजूद है, और अंत में महाकाली सबकुछ अपने भीतर घोल लेती है। वह त्रिशक्ति की &amp;quot;क्रिया शक्ति&amp;quot; हैं, और अन्य शक्ति का स्रोत है। वह कुंडलिनी शक्ति है जो हर मौजूदा जीवन रूप के मूल में गहराई से समाया रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी पार्वती का उपनिषद (वेदांत) में वर्णन==&lt;br /&gt;
108 उपनिषदों में से दूसरे सबसे प्रमुख उपनिषद &amp;quot;[[केनोपनिषद]]&amp;quot; के तृतिया और चतुर्थ खण्ड में देवी पार्वती का वर्णन है,यहाँ पर इन्हें हैमवती उमा नाम से पुकारा गया है। &amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.36&amp;quot;/&amp;gt; जहाँ पर वो ब्रह्मविद्या, परब्रह्म की शक्ति और सांसारिक माँ के रूप में दिखाई गई हैं।&amp;lt;ref name=johnmuir&amp;gt;John Muir, {{Google books|wNPaeose9K4C|Original Sanskrit Texts on the Origin and History of the People of India|page=422}}, pp 422–436&amp;lt;/ref&amp;gt; और इनको परब्रह्म और देवो के बीच मे मध्यास्था करते हुए दिखया गया है।&lt;br /&gt;
[[File:Kena Upanishad 1.1 to 1.4 verses, Samaveda, Sanskrit, Devanagari.jpg|thumb|[[केनोपनिषद]] के कुछ पांडुलिपि]]&lt;br /&gt;
*'''कथा'''&lt;br /&gt;
परब्रह्म ने देवताओं को अपने द्वारा विजय दिलवाई । परब्रह्म की उस विजय से देवताओं को अहंकार हो गया । वे समझने लगे कि यह हमारी ही विजय है । हमारी ही महिमा है । यह जानकर परब्रह्म देवताओं के सामने यक्ष के रूप में प्रकट हुए । और वे (देवता) परब्रह्म को ना जान सके कि ‘यह यक्ष कौन है’?&lt;br /&gt;
तब उन्होंने (देवों ने) अग्नि से कहा कि, ‘हे जातवेद ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । अग्नि ने कहा – ‘बहुत अच्छा’। अग्नि यक्ष के समीप गया । परब्रह्म ने अग्नि से पूछा – ‘तू कौन है’ ? अग्नि ने कहा – ‘मैं अग्नि हूँ, मैं ही जातवेदा हूँ’। ऐसे तुझ अग्नि में क्या सामर्थ्य है ?’ अग्नि ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे जलाकर भस्म कर सकता हूँ’। तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे जला’ । अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को जलाने में समर्थ न होकर वह लौट गया । वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब उन्होंने ( देवताओं ने) वायु से कहा – ‘हे वायु ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । वायु ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ । वायु यक्ष के समीप गया । उसने वायु से पूछा – ‘तू कौन है’ । वायु ने कहा – ‘मैं वायु हूँ, मैं ही मातरिश्वा हूँ’ । ‘ऐसे तुझ वायु में क्या सामर्थ्य है’ ? वायु ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे ग्रहण कर सकता हूँ’। तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे ग्रहण कर’ । अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को ग्रहण करने में समर्थ न होकर वह लौट गया । वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब उन्होंने (देवताओं ने) इन्द्र से कहा – ‘हे मघवन् ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । इन्द्र ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ । इंद्र खुद यक्ष के समीप गया । उसके सामने यक्ष (परब्रह्म) अन्तर्धान हो गए । वह इन्द्र उसी आकाश में अतिशय शोभायुक्त देवी हेमवती उमा (पार्वती) को देखा और उनके पास आ पहुँचा, और उनसे पूछा कि ‘यह यक्ष कौन था’ ॥ देवी पार्वती ने स्पष्ट कहा की– वह यक्ष ‘ब्रह्म है’ । ‘उस ब्रह्म की ही विजय में तुम इस प्रकार महिमान्वित हुए हो’ । तब से ही इन्द्र ने यह जाना कि ‘यह ब्रह्म है’ ।&lt;br /&gt;
इस प्रकार ये देव – जो कि अग्नि, वायु और इन्द्र हैं, अन्य देवों से श्रेष्ठ हुए । उन्होंने ही इस ब्रह्म का समीपस्थ स्पर्श किया और उन्होंने ही सबसे पहले देवी के द्वारा जाना कि ‘यह ब्रह्म है’। इसी प्रकार इन्द्र अन्य सभी देवों से अति श्रेष्ठ हुआ । उसने ही इस ब्रह्म का सबसे समीपस्थ स्पर्श किया । उसने ही सबसे पहले जाना कि ‘यह ब्रह्म है’॥&amp;lt;ref&amp;gt;https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A4%A6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके अलावा और भी कई उपनिषदों में देवी पार्वती का वर्णन मिलता है जहाँ देवी कुछ अलग नाम से भी जानी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पूर्वजन्म की कथा ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्वती पूर्वजन्म में [[दक्ष प्रजापति]] की पुत्री [[सती]] थीं तथा उस जन्म में भी वे भगवान [[शिव|शंकर]] की ही पत्नी थीं। [[सती]] ने अपने पिता [[दक्ष प्रजापति]] के यज्ञ में, अपने पति का अपमान न सह पाने के कारण, स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर दिया था। भगवान [[शिव|शंकर]] को जब ये बात पता चली तो उन्होंने [[वीरभद्र]] के रूप में [[दक्ष प्रजापति|दक्ष]] प्रजापति के यज्ञ को नष्ट कर दिया। भगवान शिव सती के शव को लेकर तांडव करने लगे। उसी समय भगवान विष्णु ने अपने [[सुदर्शन चक्र]] से माता [[सती]] के शव के इक्यावन भाग कर दिया। जहां जहां माता [[सती]] के ये ये अंग गिरे वहां [[शक्ति पीठ|शक्तिपीठों]] की स्थापना हुई। अगले जन्म में माता [[सती]] पार्वती बनकर हिमनरेश हिमवान के घर अवतरित हुईं।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पार्वती की तपस्या ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्वती को भगवान [[शिव]] को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये वन में तपस्या करने चली गईं। अनेक वर्षों तक कठोर उपवास करके घोर तपस्या की तत्पश्चात वैरागी भगवान शिव ने उनसे विवाह करना स्वीकार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पार्वती की परीक्षा ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान [[शिव|शंकर]] ने पार्वती के अपने प्रति अनुराग की परीक्षा लेने के लिये सप्तऋषियों को पार्वती के पास भेजा। उन्होंने पार्वती के पास जाकर उसे यह समझाने के अनेक प्रयत्न किये कि शिव जी औघड़, अमंगल वेषधारी और जटाधारी हैं और वे तुम्हारे लिये उपयुक्त वर नहीं हैं। उनके साथ विवाह करके तुम्हें सुख की प्राप्ति नहीं होगी। तुम उनका ध्यान छोड़ दो। किन्तु पार्वती अपने विचारों में दृढ़ रहीं। उनकी दृढ़ता को देखकर [[सप्तर्षि|सप्तऋषि]] अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन्हें सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद देकर शिव जी के पास वापस आ गये। सप्तऋषियों से पार्वती के अपने प्रति दृढ़ प्रेम का वृत्तान्त सुन कर भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तऋषियों ने शिव जी और पार्वती के विवाह का लग्न मुहूर्त आदि निश्चित कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== शिव जी के साथ विवाह ==&lt;br /&gt;
[[File:Shiva's wedding Nataraja Temple at Chidambaram, Tamil Nadu 2017.jpg|thumb|देवी पार्वती का शिव के साथ विवाह की कलाकृति]]&lt;br /&gt;
निश्चित दिन शिव जी बारात ले कर [[हिमालय]] के घर आये। वे बैल पर सवार थे। उनके एक हाथ में [[त्रिशूल]] और एक हाथ में [[डमरु|डमरू]] था। उनकी बारात में समस्त देवताओं के साथ उनके गण भूत, प्रेत, पिशाच आदि भी थे। सारे बाराती नाच गा रहे थे। सारे संसार को प्रसन्न करने वाली भगवान शिव की बारात अत्यंत मन मोहक थी, ब्रह्मा जी की उपस्थिति में विवाह समारोह शुरू हो गया।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/religion/story/know-the-beautiful-story-of-marriage-of-lord-shivs-and-parvati-tpral-644303-2019-02-27|title=जानिए भगवान शिव और माता पार्वती की विवाह कथा|website=आज तक|language=hi|access-date=2020-12-22}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इस तरह शुभ घड़ी और शुभ मुहूर्त में शिव जी और पार्वती का विवाह हो गया और पार्वती को साथ ले कर शिव जी अपने धाम कैलाश पर्वत पर सुख पूर्वक रहने लगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी पार्वती को समर्पित त्यौहार==&lt;br /&gt;
*'''हरतालिका तीज'''&lt;br /&gt;
हरतालिका तीज को हरतालिका व्रत या तीजा भी कहते हैं। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन होता है। इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियाँ गौरी-शंकर की पूजा करती हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में मनाया जाने वाला यह त्योहार करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है क्योंकि जहां करवाचौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है।&lt;br /&gt;
सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। इस दिन विशेष रूप से गौरी−शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://dharm.raftaar.in/religion/hinduism/vrat-katha/hartalika-teej |title=हरतालिका तीज व्रत कथा |author= |date= |work=कथा |publisher=रफ़्तार |accessdate=३ अगस्त २०१६ |archive-url=https://web.archive.org/web/20160801215109/http://dharm.raftaar.in/religion/hinduism/vrat-katha/hartalika-teej |archive-date=1 अगस्त 2016 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''नवरात्रि'''&lt;br /&gt;
पार्वती की श्रद्धा में एक और लोकप्रिय त्योहार [[नवरात्रि]] है, जिसमें नौ दिनों तक उनकी सभी रूपो की पूजा की जाती है। पूर्वी भारत में विशेष रूप से बंगाल, ओडिशा, झारखंड और असम के साथ-साथ भारत के कई अन्य हिस्सों जैसे कि गुजरात में उनके नौ रूप यानी [[शैलपुत्री]], [[ब्रह्मचारिणी]], [[चंद्रघंटा]], [[कुष्मांडा]], [[स्कंदमाता]], [[कात्यायिनी]], [[कालरात्रि]], [[महागौरी]], [[सिद्धिदात्री]] की पूजा की जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;S Gupta (2002), Festivals of India, {{ISBN|978-8124108697}}, pp 68–71&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और भी कई स्थानीय त्यौहार है जो देवी पार्वती को समर्पित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रमुख मंदिर==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्वती अक्सर शिव के साथ पूरे दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के शिव मंदिरों में मौजूद रहती हैं।&lt;br /&gt;
कुछ स्थान जैसे [[शक्ति पीठ]] को उनके ऐतिहासिक महत्व और हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में उनकी उत्पत्ति के बारे में बताया गया है और विशेष माना गया है।&amp;lt;ref name=sleuthold&amp;gt;Steven Leuthold (2011), Cross-Cultural Issues in Art: Frames for Understanding, Routledge, {{ISBN|978-0415578004}}, pp 142–143&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:Kamakhya Temple by Vikramjit Kakati.jpg|thumb|कामाख्या शक्तिपीठ मंदिर, असम]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* 51 शक्तिपीठ के नाम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{इक्यावन शक्तिपीठ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी पार्वती भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर==&lt;br /&gt;
{{multiple image&lt;br /&gt;
 | direction = horizontal&lt;br /&gt;
 | width1 = 125&lt;br /&gt;
 | width2 = 154&lt;br /&gt;
 | footer = उमा या दुर्गा की मूर्ति के रूप में देवी पार्वती दक्षिण पूर्व एशिया में पाई गई हैं। 8वीं शताब्दी की पार्वती [[कम्बोडिया]] (बाएं) और 14 वीं शताब्दी की पार्वती [[जावा (द्वीप)]],[[इंडोनेशिया]]&lt;br /&gt;
 | image1 = Uma Kambodscha Rietberg RHI 1.jpg &lt;br /&gt;
 | image2 = Javanese Queen as Parvati.jpg&lt;br /&gt;
 }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवी पार्वती की प्रतिमा या मूर्तिकला, दक्षिण एशिया के मंदिरों और साहित्य में पाई गई हैं। उदाहरण के लिए, [[कम्बोडिया]] में खमेर के प्रारंभिक शैव शिलालेख, जो पांचवीं शताब्दी ईस्वी के आस पास के समय की है, उनमें पार्वती (उमा) और शिव का उल्लेख है। &amp;lt;ref&amp;gt;Sanderson, Alexis (2004), &amp;quot;The Saiva Religion among the Khmers, Part I.&amp;quot;, Bulletin de Ecole frangaise d'Etreme-Orient, 90–91, pp 349–462&amp;lt;/ref&amp;gt; कई प्राचीन और मध्यकालीन युग के कंबोडियन मंदिर, पत्थर की कला और नदी तल की नक्काशी पाई गई है जो पार्वती और शिव को समर्पित हैं। &amp;lt;ref&amp;gt;Michael Tawa (2001), At Kbal Spean, Architectural Theory Review, Volume 6, Issue 1, pp 134–137&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Helen Jessup (2008), The rock shelter of Peuong Kumnu and Visnu Images on Phnom Kulen, Vol. 2, National University of Singapore Press, {{ISBN|978-9971694050}}, pp. 184–192&amp;lt;/ref&amp;gt; बोइसेलियर ने [[वियतनाम]] में उमा के साक्ष्य की खोज चम्पा युग के मंदिरों में की है। &amp;lt;ref&amp;gt;[[Jean Boisselier]] (2002), &amp;quot;The Art of Champa&amp;quot;, in Emmanuel Guillon (Editor) – Hindu-Buddhist Art in Vietnam: Treasures from Champa, Trumbull, p. 39&amp;lt;/ref&amp;gt; शिव के साथ पार्वती को उमा के रूप में समर्पित दर्जनों प्राचीन मंदिर [[इंडोनेशिया]] और [[मलेशिया]] के द्वीपों में पाए गए हैं। दुर्गा के रूप में पार्वती का अवतार दक्षिण-पूर्व एशिया में भी पाया गया है।  &amp;lt;ref&amp;gt;Hariani Santiko (1997), The Goddess Durgā in the East-Javanese Period, Asian Folklore Studies, Vol. 56, No. 2 (1997), pp. 209–226&amp;lt;/ref&amp;gt;[[जावा (द्वीप)]] में कई मंदिर शिव-पार्वती को समर्पित हैं जो पहली सहस्राब्दी ईस्वी की दूसरी छमाही से हैं और कुछ बाद की शताब्दियों के।  &amp;lt;ref&amp;gt;R Ghose (1966), [http://hub.hku.hk/bitstream/10722/28763/1/FullText.pdf Saivism in Indonesia during the Hindu-Javanese period] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141226041451/http://hub.hku.hk/bitstream/10722/28763/1/FullText.pdf |date=26 December 2014 }}, Thesis, Department of History, University of Hong Kong&amp;lt;/ref&amp;gt; माँ दुर्गा के चिह्न और पूजा के साक्ष्य 10 वीं से 13 वीं शताब्दी के बीच की मिली है। &amp;lt;ref&amp;gt;Peter Levenda (2011), Tantric Temples: Eros and Magic in Java, {{ISBN|978-0892541690}}, pp 274&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://spiritualworld.co.in/religious-songs-and-vrat-kathayen/hindu-aarti-collection/shri-parwati-ji-ki-aarti-in-hindi-and-english श्री पार्वती जी की आरती]&lt;br /&gt;
* [https://spiritualworld.co.in/religious-songs-and-vrat-kathayen/hindu-aarti-collection/shri-gori-ambey-ji-ki-aarti-in-hindi-and-english श्री गौरी अम्बे जी की आरती]&lt;br /&gt;
उमा संहिता&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू देवियाँ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
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== सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>2409:4051:11C:6A79:E4FC:1D62:9E3C:ED2B</name></author>
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